प्रश्न 1 – महाराज जी ध्यान पुर्वक सुनने के बाद भी सतसंग याद नहीं रहता और मनन करने की कोशिश करते हैं तो भी याद नहीं आता?
उत्तर – क्योंकि उसके प्रति महत्व बुद्धि नहीं है यदि हम संसार की बात करें, विषय की बात करें तो उसे पुनः याद नही करना पड़ेगा। वो दिमाग में बस जाएगा क्योंकि उसके प्रति महत्व बुद्धि है। जैसे किसी भी चीज की बात हो खान-पान, देखना- सुनना आदि। हमें इसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा वो हमारे दिमाग में बस जाएगा। उसको ध्यान नहीं करना पड़ेगा क्योंकि पहले से इसी में रमण कर रहें हैं। और प्रभु एक परदेश जैसी बात लगते हैं क्योंकि अपनापन उनसे हुआ नहीं, महत्व बुद्धि हुई नहीं, तो दुसरे की बत सुनने के लिए हमारी श्रवण इन्द्री कितनी देर राजी रहेगी। प्रभु दुसरे लगते हैं ना, प्रभु अपनी आत्मा नही लगते। प्रभु समुद्र नहीं लगते हैं। हमें प्रभु से प्यार नही है तो हमें जिनसे प्यार होगा वही बात तो चिन्तन, मनन में आएगी। हमें संसार से प्यार है इसलिए चिन्तन, मनन इसी का होता है और प्रभु से प्यार हो जाएगा तो कोई घण्टों संसार की बात करता रहे हमें सुनाई ही नही देगा। ये बात तो हमें अन्दर से माननी होगी कि मुझे संसार का नही प्रभु का प्यार चाहिए। मुझे संसार का झुठा सुख नही प्रभु चाहिए। ये निश्चय अपने को करना होगा। अभी जो भी भक्ति करते हैं संसार के लिए ही करते हैं, हमारा बेटा, हमारा परिवार, रिश्तेदार सब सुरक्षित रहें, भगवान ऐसी कृपा करो। तो इसमें चिन्तन प्रभु का थोड़ी हुआ,चिन्तन तो उनका हुआ, जिनके लिए आप आशीर्वाद मांग रहे हो। नाम जप करो, भजन करो, भगवत चर्चा सुनो, ठाकुर सेवा करो, सन्तों का संघ करो वचनों का, सन्तों के बीच बैठ जाना इसे सतसंग नहीं कहते इससे वो समय अच्छी जगह व्यतीत हुआ अन्यथा और कोई लाभ नहीं। सतसंग में जो बात सुनों उसको अपने आचरण में उतारो, उसे मानो तब तुम सतसंग कर रहे हो। सिर्फ सुनने से कोई लाभ नहीं है उसे अपने जीवन में अपनाओ। लाभ प्रभु के चिन्तन से मिलेगा।
प्रश्न 2 – गुरूदेव जब आपको दूर से देखते हैं तो बहुत मन में बहुत प्रसन्नता और शीतलता मिलती है, परन्तु जब आप यहाँ हमारे सामने बैठें हैं तो मन में धक-धक होने लगती है ऐसा लगता है कि बस अब प्राण निकल ही जाऐंगे?
उत्तर – हाँ ये कृपा है, आपकी ही नही हमारी भी होती है। जब हम अपने गुरूदेव के पास जाते हैं क्योंकि अपने गुरूदेव को हमने परब्रह्म माना है, अपना मालिक माना है। तो दूर से तो हमारे मालिक हैं चिन्तन, लेकिन जब समीप पहुँचते है तो घबराहट पैदा हो जाती है। कहीं कोई त्रूटी न हो जाए। तो एक मन में स्वभाविक भागवतिक घबराहट होती है वो घबराहट आपको माया घबराहट से मुक्त कर देगी। वो क्या होता है न कि जो आपने भाव कर रखा है कि हमारे गुरूदेव, ये मन, इन्द्रियाँ सब उनके सामने डर रहे है। ये डरे रहे न तो अच्छा रहेगा, मंगल रहेगा। जो गुरूजनों से डरते नहीं है मनमानी आचरण उनके बनते रहते है तो फिर वो परमार्थ प्राप्त नही कर सकते। जब ये डर बैठ जाए कि यहाँ तो है ही एकान्त में भी इनकी दृष्टी हमारे ऊपर रहती है। ये तो सब जानते हैं यदि कोई गलत कार्य हो गया, गलत चिन्तन हो गया तो ये जान जाऐंगे फिर हमारा सब भाव बिगड़ जाएगा। वो उपासक फिर पाप आचरण नही कर पाएगा। वो सब जगह अपने गुरूदेव को अपने साथ देखेगा। ये डर साधक को महात्मा बना देता है।
प्रश्न 3 – गुरूदेव साधक की सरणागति में ऐसी स्थिति होती है जब उसको विषय परास्त करते है उस समय उसको जलन और चिन्ता होती है और थोड़े देर बाद लगता है कि हम क्यों चिन्ता करें ये तो श्री जी जाने क्योंकि श्री जी को समर्पित हो गया है तो क्या ये स्थिति आती है गुरूदेव?
उत्तर – ऐसा भी अगर सोचता रहेगा और प्रयास करता रहेगा कि जो आज्ञा के विरूद्ध आचरण हो वो हमसे न हो फिर भी प्रयास करता है तो वो जीत जाएगा। अगर जलन हो रही है वो सोच रहा है एक दिन तो कृपा होगी ही उसने ठान लिया है कृपा के आश्रित होकर निरविकार होने का तो एक दिन कृपा होगी निरविकार हो जाएगा पर वो कोशिश करता रहे शास्त्र विरूद्ध आचरण हमसे न हो और अगर हो जाए तो इतना निरास नही होना कि हमारा मार्ग ही छूट जाए। हम बहुत प्रयास करेंगे। हम हजार बार गिरेंगे फिर भी दौड़ेंगे श्री जी की तरफ ही चाहे कुछ भी हो जाए हम रूकने वाले नही हैं बस ये ठानना चाहिए। ऐसा नही होना चाहिए कि हम गिर गये तो चल ही नही पाऐंगे। ये फिसलन का मार्ग है कोई भी गिर सकता है बस ये उत्साह रखना कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो अब हम रूकने वाले नहीं। हमें प्रिया प्रीतम से एक बार तो हृदय से समर्पण का भाव प्रस्तुत कर देना है कि जैसे हैं वैसे आपके हैं। बार-बार यही देखते रहना है कि हम आपके हैं। हम देखते हैं कि कब आपका कृपा प्रकाश होगा और ये अंधकार मिटेगा, हमारे मिटाने से तो मिट नही रहा है। दुःखी होना, जलन होना, अशान्ती होना ये सब साधक का लक्षण है। अशुद्ध आचरण होने पर वह दुःख तो होगा ही सुखी थोड़ी होगा। सुखी तो संसारी आदमी होता है। पर वो अन्दर ही अन्दर जलेगा कि ऐसा क्यों होता है नही होना चाहिए। पर वो जानता है कि मेरे से बन नही पा रहा है वो मेरे अराध्य देव कब कृपा करेंगे तो वो बाट जोहता रहता है धीरे-धीरे सब ठीक हो जाता है।
प्रश्न 4 – हे गुरूदेव मन में जो भी प्रश्न उठता है उसका समाधान अगले ही क्षण सतसंग में मिल जाता है फिर भी विकार बार-बार परास्त कर रहे है जिससे भगवत मार्ग में चलने उत्साह में कमी आती है।
उत्तर – बात ये देखने की है कि सुन लिया और समझ लिया कि घी फायदेमन्द है इसे खाने से ताकत आती है लेकिन ताकत तब तक नही आऐगी जब तक उसे खाऐंगे नही। घी की ताकत पाने के लिए उसे खाना होगा। उसी प्रकार नाम की महिमा सुन ली, धाम की महिमा सुन ली, प्रभु की महिमा सुन ली वो तो है सत्य है। उनको आप अपनाओ तब विकार खत्म हो जाएगा। सिर्फ जानकारी रखने से कुछ नही होगा। विकार का अर्थ है जो अज्ञान जनित संसार में सुख भोगने की लालसा है वो ज्ञान जनित प्रकाश से प्रभु को समझने लगेगी। तो हमारा सांसारिक