हिंदी साहित्य में सूरदास जी भक्ति काल के महान कवि थे। जैसे तुलसी दास जी को श्री राम जी का परम भक्त है। उसी प्रकार सूरदास जी को श्री कृष्ण जी का परम भक्त  है। वह हर समय कृष्ण भक्ति में ही मगन रहते थे। वे ब्रज भाषा के महान कवि थे । सूररदास जी के जन्मांध होने के बाद भी उन्होंने श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का इतना सुन्दर चित्रण किया है। इतनी अद्भुत झाँकी प्रस्तुत की है कि हिन्दी साहित्य के विद्वान उनको जन्मांध स्वीकार ही नही करते हैं। उनकी भक्ति सम्पुर्ण जगत में विख्यात है। इन्हें  काव्य लिखने वाले मुख्य कवियों में  सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इनका जन्म मथुरा से आगरा जाने वाले मार्ग पर स्थित रुनकता नामक गॉव में हुआ था। इनका जन्म सन् 1478 ई. (समवत् 1540) के आस – पास माना जाता है। इनके पिता जी का नाम पंडित राम दास जी था तथा इनकी माता का नाम श्रीमति जमुनादास जी था । सूरदास जी जन्म से ही अन्धे थे । जिस कारण इनके माता – पिता ने बचपन मे ही त्याग दिया था। मात्र 6वर्ष की अवस्था में गंगा किनारे रहने लगे। वे बचपन से ही भगवान श्री कृष्ण  की भक्ति किया करते  थे । उनके जीवन का एक मात्र सहारा कृष्ण भक्ति था । इस कारण उनका श्री कृष्ण भगवान से अलग ही प्रकार का नाता था । वे श्री कृष्ण जी के परम भक्त थे । उनके मन में श्री कृष्ण को पाने की लालसा उत्पन्न हुई। श्री कृष्ण को पाने की बढ़ती लालसा  के कारण उन्होंने वृन्दावन धाम जाने की सोची। अन्ततः उन्होंने वृन्दावन जाने का निश्चय किया। जब वे वृन्दावन पहुँचे तो उनको वहाँ बल्लभाचार्य जी मिले। वे सुरदास जी से सिर्फ दस साल ही बड़े थे । एक बार जब बल्लभाचार्य जी  मथुरा में भ्रमण कर रहे थे, तो उन्हें गऊघाट पर बैठे एक व्यक्ति की छवी दिखाई पड़ी जो कृष्ण भक्ति में डुबे हुए थे और उनका व्यक्तित्व बहुत ही तेजस्वी लग रहा था । बल्लभाचार्यजी ने उनसे उनका नाम पुछा तो उन्होंने अपना नाम सूरदास बताया। बल्लभाचार्य जी उनके तेजस्वी रूप को देखकर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सूरदास जी को अपना शिष्य बना लिया। फिर बल्लभाचार्य जी सूरदास जी को श्रीनाथ ले गए। वहाँ बल्लभाचार्य जी ने गोवर्धन पर श्री नाथ जी का प्रसिद्ध मन्दिर बनवाया था और उस  मन्दिर की सभी जिम्मेदारियाँ सूरदास जी को प्रदान कर दीं। वहाँ सूरदास जी अनेको भजन गाने लगे। बल्लभाचार्य जी की शिक्षा के कारण सूरदास जी को उनके जीवन (भक्ति) की सही दिशा मिल गई। बल्लभाचार्य जी के पुत्र जिनका नाम विट्ठलनाथ था । उन्होंने आठ कृष्ण भक्त कवियों का एक मण्डल बनाया। जिसे “अष्टछाप” कहा जाता है। जिनमें सूरदास जी अष्टछाप के मुख्य एवं सर्वश्रेष्ठ कवि थे । सूरदास जी के भजनों की चर्चा  सम्पुर्ण देश में होने लगी। एक बार इनके भजनों की चर्चा अकबर ने भी सुनी। उन्होंने सोचा कि तानसेन से ज्यादा संगीत सम्राट कौन हो सकता है। यही जानने की लालसा के कारण वे सूरदास जी से मिलने मथुरा आ गये। सूरदास जी से मिलकर अकबर ने कहा कि आप मुझे श्री कृष्ण के भजन सुनाऐं। यदि आप मुझे श्री कृष्ण के भजन सुनाऐंगे तो मैं आपको बहुत सा धन दुँगा। यह सुनकर सूरदास जी ने कहा कि हमें किसी भी धन की कोई लालसा नहीं। यह कहकर वे भजन सुनाने लगे। उस दिन से अकबर सूरदास जी से प्रभावित हो गये।  

  सूरदास जी अपने जीवन के अन्तिम दिनों में गोवर्धन के परसौली नामक स्थान पर चले गये। वहीं पर सन् 1583 ई. में (समवत् 1640 वी.) में महान कवि सूरदास जी स्वर्गवासी हो गये। अपनी मृत्यु से पुर्व विट्ठलनाथ जी के पुछने पर सूरदास जी ने अग्र पद बनाया।

खंजन जैन, रूप रस माते। अति सै चारु चपल अनियारे, पल पीजरा न समाते।।

साहित्यिक परिचय – सूरदास जी हिन्दी साहित्य के महान कवि थे । इनका कला और काव्य भाव, दोनों ही दृष्टी से सर्वोत्तम काव्य है। सूरदास जी श्रृंगार रस के श्रेष्ठ कवि थे । इन्होने प्रेम रस एवं वातसल्य रस का बहुत सुन्दर चित्रण किया है। सूरदास जी भक्ति काल के कृष्णाश्रयी शाखा के प्रमुख कवि थे । सूरदास जी को वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है। 

जशोदा हरि पालनै झुलावै।

हलरावै, दुलरावै मल्हावै, जोइ – जोइ कछु गावै।।

मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।

तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्हा बुलावै।।

कबहुँ पलक गरि मूँद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।

सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि – करि सैन बतावै।।

इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै।

जो सुख सूर अमर – मुनि दुरलभ, सो नन्द – भामिनि पावै।।

सूरदास जी हिन्दी साहित्य के  सूर्य हैं। इसलिए इनका हिन्दी साहित्य में स्थान सर्वोत्तम है।  

भाषा – शैली – सूरदास जी ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि थे । सूरदास जी के पद गीतात्मक हैं। सूरदास जी को गेय पद के साथ – साथ लीला – पद भी कहा जाता है। उनकी भाषा में साहित्यिक प्रवाह हैं। सूरदास जी ने सरल एवं प्रभावपुर्ण शैली का प्रयोग किया है। उनका काव्य, मुक्तक शैली पर आधारित है।

रचना –  सूरदास जी ने सवा लाख पदों की रचना की थी । जिनमें से आठ, दस हजार पद ही प्राप्त हुए हैं। “काशी नागरी प्रचारणी” सभा के पुस्तकालय में ये सभी रचनाऐं सुरक्षित रखी गयीं हैं। सूरदास जी तीन ग्रन्थ प्रमुख हैं । जैसे –

  1. सूरसागर – यह एक गीत काव्य है जो श्रीमद् भागवत ग्रन्थ से लिया गया है। सूरदास जी ने इस काव्य में कृष्ण की बाल – लीलाओं , गोपी प्रेम, गोपी विरह, उद्दव – गोपी संवाद आदि प्रसंग प्रस्तुत किये हैं।

साहित्य लहरी, सूरसागर, सूर कि सारावली । श्री कृष्ण जी की बाल छवि पर लेखनी अनुपम चली।।

 

  1. सूरसारावली – यह काव्य भी सूरसागर पर आधारित है। इसमें कुल 1107 पदों का संग्रह हैं।
  2. साहित्यलहरी – इस काव्य में भी बाल – लीलाओं का वर्णन हैं तथा कुछ स्थानों पर महाभारत कथा के अंश भी हैं। इसमे कुल 118 पदों का समावेश है।