सूरदास जी महान कवि थे । वे  श्रृंगार रस, प्रेम रस और वात्सल्य रस के सर्वश्रेष्ठ कवि थे । उन्हें वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है। वे पद गाया करते थे । वे प्रतिदिन बिहारी जी के पद मन्दिर में जाकर गाया करते थे । उनके पद बिहारी जी को अत्यन्त प्रिय लगते थे । इसलिए बिहारी जी उनकी कुटिया में पद सुनने के लिए जाया करते थे । एक बार की बात है। सुरदास जी अपने नित्य कर्मानुसार पद गाकर अपनी कुटिया के ओर प्रस्थान करने लगे उसी समय बिहारी जी उनके पीछे – पीछे उनकी कुटिया की ओर जाने लगे। बिहारी जी उनकी कुटिया में पहुँचकर पद सुनकर लौट आए। उनके लौटने पर राधा रानी जी ने बिहारी जी से पुछा की आप प्रतिदिन कहाँ जाते हैं। राधा रानी के पुछने पर बिहारी जी ने कहा कि मैं प्रतिदिन भ्रमण करने जाता हुँ। यह सुनकर राधा रानी जी ने कहा कि कल हम भी आपके साथ भ्रमण करने जाऐंगे। बिहारी जी ने मना कर दिया। तो राधा रानी हठ करने लगीं। अन्ततः राधा रानी जी की बात बिहारी जी को माननी पड़ी। बिहारी जी ने कहा कि ठीक है, चलिए हमारे साथ परन्तु आप कुछ बोलेंगी नहीं। प्रातः काल बिहारी जी और राधा रानी जी भ्रमण के लिए गये। तब बिहारी जी राधा रानी जी को लेकर सूरदास जी के पीछे – पीछे उनकी कुटिया की ओर चल पड़े और राधा रानी जी से कहने लगे कि कुछ बोलना नही। इतना कहकर बिहारी जी और राधा रानी उनकी कुटिया में प्रवेश किया। सूरदास जी पद गा रहे थे । उनके पदों को दोनों ने सुना। पद गाकर सूरदास जी जाने लगे। उनको जाता देखकर राधा रानी जी ने कहा ये कहाँ जा रहे हैं, हमें देखना चाहिए। क्योंकि वे अन्धे हैं। बिहारी जी ने कहा कि वे रोज ऐसा किया करते हैं उन्हें पता है कि वे किधर जा रहे हैं। और क्यों जा रहे है। तभी अचानक सूरदास जी के रास्ते में एक बड़ा सा गड्ढ़ा आ गया। उस गड्ढ़े को देखकर राधा रानी जी ने कहा कि आपको इन्हें बचाना होगा। सूरदास जी गड्ढ़े में गिर जाऐंगे। बिहारी जी ने कहा उनको पता है कि उन्हें कैसे बचना है। वे अभी बात – चीत कर ही रहे थे कि सूरदास जी गड्ढ़े में गिर गये। राधा रानी जी के हठ करते हुए सूरदास जी को बचाने के लिए कहा । बिहारी जी ने कहा ठीक है। बिहारी जी ने कहा – बाबा मैं पीताम्बर लटका रहा हुँ इसको पकड़कर आप ऊपर आ जाइए। बिहारी जी की आवाज सुनकर सूरदास जी ने सोचा कि इतनी मधुर आवाज किसकी है और ये जो सुगन्ध आ रही है ये तो वैसी ही सुगन्ध है जिसका हम बिहारी जी को तिलक लगाते हैं। यह सोचकर सूरदास जी पीताम्बर पकड़कर गड्ढ़े से बाहर आ गये। बाहर आते ही वे राधा रानी के चरणों में गिर गये। जिस कारण राधा रानी जी की पायल सूरदास जी के हाथों में आ गयी। सूरदास जी को गड्ढ़े से निकाल कर वे देने ही अपने धाम की ओर जाने लगे। तब राधा रानी जी ने कहा कि हमारी एक पायल को गयी है। आप हमें ढ़ुढ़कर दे दीजिए। बिहारी जी पायल को ढ़ढ़ने के लिए सूरदास जी के पास गये और कहने लगे बाबा आपके पास हमारी सखी पायल है क्या? अगर है तो दे दीजिए हमे घर जाना है। माँ इन्तजार कर रही होंगी। सूरदास जी ने कहा कि हमारे पास यही एक पायल है। परन्तु हम यकीन कैसे करें कि ये आपकी पायल है। मैं तो अन्धा हुँ। बिहारी जी ने कहा – अरे बाबा मैंने आपको बचाया है। सूरदास जी ने कहा – यदि आपके बाद कोई और आकर कहेगा तो मैं कैसे उसे समझाऊँगा। यदि ये पायल आपकी है तो मुझे प्रमाण दीजिए। बिहारी जी ने कहा – मैं कैसे प्रमाणित करूँ, आप ही बताइये। यदि ये पायल आपकी है तो उनको बुलाइये जिनकी यह पायल है मै दुसरी पायल छु कर पहचान लुँगा कि ये दुसरी पायल उसी पैर की है या नही। यह सुनकर बिहारी जी ने राधा रानी को सारी बात बतायी और उनको बुलाया। जब राधा रानी अपनी पायल लेने के लिए आईं तो सूरदास जी ने उनके पैर पकड़ लिये। बिहारी जी ने कहा कि अब तो आपको यकीन हो गया कि ये पायल हमारी है। अब हमें ये पायल दे दीजिए। सूरदास जी ने पायल तो दे दी। परन्तु पैर नही छोड़े। राधा रानी जी ने कहा हमारे पैर छोड़िये हमें घर जाना है। उन्होंने पैर नहीं छोड़े। बिहारी जी ने भी कहा – सुरदास जी ने फिर भी पैर नही छोड़े। सूरदास जी ने कहा कि हमने आपको पहचान लिया है कि आप जुगल जोड़ी सहित आये हैं। आप दोनों हम पर अपनी कृपा करिये। और कृपया आप दोनों मुझे दर्शन दीजिए। मैं इस जुगल जोड़ी के दर्शन करना चाहता हुँ। यह सुनकर राधा रानी मुस्कुराईं । सूरदास जी अन्धे थे तो वे बिना नेत्रों के वे दर्शन नहीं कर सकते थे । इसलिए राधा रानी जी ने  सूरदास जी को नेत्र प्रदान किये। तब सूरदास जी ने बिहारी जी और राधा रानी जी के दर्शन किये। दर्शन कर लेने के बाद सूरदास जी ने कहा – हे राधा रानी आपने जो नेत्र मुझे प्रदान किये हैं, कृपया उन्हें आप वापस ले लीजिए। राधा रानी जी ने पुछा क्यों। आपके पास नेत्र नही थे हमने आपको नेत्र प्रदान कर दिये। अब आप इन नेत्रों के साथ अपना जीवन व्यतीत कीजिए। यह सुनकर सूरदास जी ने कहा – नहीं मैंने आप दोनों के दर्शन कर लिए अब मुझे इन नेत्रों से इस संसार को नही देखना है। इसलिए कृपया इन नेत्रों को आप वापस ले लीजिए।