• न ब्राह्मणस्य गां जग्ध्वा राष्ट्रे जागार कश्चन् ।

                                                                (अथर्ववेद 5/19/10)

जहां ब्राह्मण का तिरस्कार होता है, वहां से सदा के लिए सुख-शांति चली जाती है ।

  • चतुश्पदां गौः प्रवरा लोहानां काञ्चनं वरम् ।

         शब्दानां प्रवरो मंत्रो ब्राह्मणो द्विपदां वरः ।।

                                                        (महाभारत / शांतिपर्व 11/11)

चौपाये जीवों में गाय उत्तम है, धातुओं में सोना उत्तम है । शब्दों में वेदमंत्र उत्तम है और दो पैर वालों में ब्राह्मण उत्तम है।

  • शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।

         ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।।

                                                          (श्रीमद्भगवद्गीता 18/42)

अंतःकरण का निग्रह, इंद्रियों के अपराधों कोक्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, ईश्वर  और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन और परमात्मा के तत्व का अनुभव करना – ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं ।

  • ये हृह्यन्ति द्विजान् मूढ़ाः सन्ति ते मम शत्रवः ।।

          ये पूजयन्ति विप्राश्च मम भावेन पूजनाः ।

          ते भूञ्जन्ति सुखं चात्र ह्यन्ते यास्यन्ति मत्पदम् ।।

                                                                      (गर्गसंहिता / अश्वमेध 55/52-53)

विष्णुभगवान् कहते हैं – जो अविवेकीजन ब्राह्मणों से द्वेष रखते हैं, वे मेरे  शत्रु हैं । जो मनुष्य मेरी भावना से ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, उन्हें संसार में सुख की उपलब्धि होती है और अंत में मेरे धाम के अधिकारी होते हैं ।

  • अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।

          दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मनः ।।

          षष्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका ।

          याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ।।

                                                             (मनुस्मृति 10/75-76)

पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, कराना, दान देना और लेना – ये ब्राह्मण के छह कर्म हैं । इन छह कर्मों में पढ़ाना, यज्ञ कराना और विशुद्ध द्विजातियों से दान ग्रहण करना – ये तीनों ब्राह्मणकी जीविका के कर्म हैं ।

  • ब्राह्मणस्याश्रुतं मलम् ।

                                  (महाभारत / कर्णपर्व 45/23)

वेद (कम से कम गायत्रीमंत्र) से शून्य होना ब्राह्मण के लिए कलंक है ।

  • नवनीतं हृदयं ब्राह्मणस्य वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधारः।

                                                                       (महाभारत / आदिपर्व 313/123)

ब्राह्मण का हृदय मक्खन जैसा मृदु (कोमल) होता है, पर उसकी वाणी में तीक्ष्ण-धार वाला क्षुरा (उस्तरा) रखा हुआ है ।

  • चतुर्वेदोअपि दुर्वृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते ।

          योअग्निहोत्रपरो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृतः ।।

                                                             (महाभारत / वनपर्व 313/111)

चारों वेदों के ज्ञाता होनो पर भी यदि कोई दुराचारी है, तो वह शूद्र से भी बढ़कर है और जो केवल अग्निहोत्र करता है (वेदादि के विधान से) पर जितेंन्द्रिय (इंद्रियों को वश में किए हुए) है, वही वस्तुतः ब्राह्मण है ।

  • सत्यं दानमथाद्रोह अनृशंस्य त्रपाघृणा ।

          तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ।।

                                                            (महाभारत / शांतिपर्व 189/4)

जिसके अंदर सच्चाई, दान देना, क्षमा करना, मधुर स्वभाव, क्रुरता से रहित, दुष्कर्मों से अलग रहना, दया भाव, तप, धर्म के मार्ग को न छोड़ना जैसे गुण हों, वह ब्राह्मण कहलाता है ।

  • अदान्तो ब्राह्मणोअसाधुः ।

                      (महाभारत / सौप्तिकपर्व 3/20)

जो इंन्द्रियों को अपने वश में नहीं रख सकता है, वह सच्चा ब्राह्मण नहीं है।

  • मन्त्रज्येष्ठा द्विजातयः ।

                            (महाभारत / अद्योगपर्व 168/17)

वेदों का अध्ययन-अध्यापन ब्राह्मणों के लिए श्रेष्ठ कर्म है ।

  • मन क्रम बचन करट तजि जो कर भुसूर सेव ।

          मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ।।

                                                  (श्रीरामचरितमानस / अरण्यकांड 33)

मन, वचन और कर्म से करट छोड़कर जो इस पृथ्वी के प्रत्यक्ष देव रूप ब्राह्मणों की सेवा करता है, सब देवता उसके वश में हो जाते हैं ।

  • देवाधीनं जगत्सर्वं मन्त्राधीनञ्च देवता ।

          ते मन्त्रा विप्रं जानन्ति तस्मात् ब्राह्मण देवता ।।

 अर्थात् यह संसार देवों के अधीन है और देवता मंत्रों के अधीन होते हैं । उन सभी मंत्रों का ब्राह्मण जानते हैं, अतः ब्राह्मण ही परमदेवता माने गए हैं ।

  • मंगल मूल बिप्र परितोषू । दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ।।

                                                                     (श्रीरामचरितमानस / अयो. 126/2)

ब्राह्मणों को प्रसन्नता होना ही मंगल की जड़ है । ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुल को भी भस्म कर देता है ।