एक गाँव में एक चरवाहा रहता था । जिसका नाम गोपाल था । उसकी पचास वर्ष की अवस्था थी। वह अनपड़ था । उसे पूजा – पाठ, भक्ति का भी ज्ञान नहीं था । वह सारा दिन वन जाकर गईया चराता था । अत्यधिक सीधा होने के कारण गाँव के लोग अपनी गईया भी उसी को सौंप देते  थे । कि भईया हमारी गाय भी ले जाना । उसके बदले में लोग उसे थोड़ा बहुत कुछ खाने को दे देते थे । एक दिन वह जंगल में गाय चरा रहा था । तो कुछ साधु – सन्त वहाँ से होते हुए राम नाम का कीर्तन  करते हुए जा रहे थे । गोपाल ने राम नाम सुना तो वह भी जोर – जोर आवाज से राम नाम कीर्तन करने लगा। उसको वह कीर्तन इतना अच्छा लगा कि  वह हर समय राम नाम गाने सगा। अब उसका यही काम था । गाय चराना और राम नाम कीरितन करना। गाँव वालों ने जब उसे राम नाम कीर्तन करते हुए देखा तो वह उसका मजाक बनाने लगे। और तरह – तरह की बातें करने लगे। कोई कहता कि ये राम नाम कीर्तन से क्या होगा। तो कोई कहता कि ये पागल हो गया है। तो कुछ पुछते कि इससे तुम्हें क्या लाभ है जो तुम करते हो । तब गोपाल कहता कि मुझे नही मालुम कि इसका कोई मतलब भी होता है। और इससे क्या लाभ है। कुछ सन्त राम नाम गा रहे थे तो मुझे अच्छा लगा तो मैं भी राम  नाम गाने लगा। बस ये मुझे अच्छा लगता है इसलिए मैं गाता हुँ । गाँव के कुछ लोग कहने लगे कि तुम्हारा तो कोई गुरू भी नही  हैं। अगर ये नाम तुम्हें गुरू ने दिया होता तब भी कुछ समझ में आता। इस तरह की बातें कर करकर लोग उस पर हंसने लगे। गोपाल सोचने लगा कि पता नही ये लोग क्यों ऐसी बातें कर रहे हैं। अब मैं कहाँ से गुरू को ढ़ुढ़ु? कहाँ से अपना गुरू बनाऊँ? अब कौन मुझे बताऐगा कि ये राम नाम सही है या नहीं। गोपाल फिर से अपना काम करने लगा और राम नाम कीर्तन करे लगा। उसे राम नाम अच्छा लगता था इसलिए वह राम नाम गाता रहता था। वह जंगल में जाकर सन्तों का इन्तजार करने लगा। ताकि यदि कोई सन्त उसे दिख जाए तो वह उनसे पुछ सके कि वो जो राम नाम कीर्तन करता है वो कीर्तन करना चाहिए या नहीं, या उससे उसे क्या लाभ है। इसलिए वह जंगल जाकर राम नाम कीर्तन करते हुए सन्तों की राह देखने लगा। एक दिन उसको जंगल में एक सन्त आते हुए दिखे। गोपाल ने सन्त को आते हुए देखा तो वह भागता हुआ उनके पास गया और उनके पैरों में गिर गया। और उनसे प्रार्थना करने लगा कि मुझे अपना शिष्य बना लीजिए। सन्त ने कहा कि ऐसे कैसे मैं तुम्हें अपना शिष्य बना लुँ। तुम मेरे पैर छोड़ों और मुझे जाने दो। गोपाल कहता कि मैं आपके पैर तब तक नही छोड़ुगा जब तक आप मुझे अपना शिष्य नही बना लेते। सन्त कहते कि रास्ते चलते शिष्य नही बनाऐ जाते । गोपाल कहता है कि मैने तो आपको अपना गुरू बना लिया है। अब आप मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर लीजिए। मेरे मन में कुछ संशय है कृप्या आप उसका समाधान करें। इस तरह जब गोपाल हठ करने लगा तब सन्त ने कहा ठीक है। जाओ पहले तुम स्नान करके आओ। तब तक मैं तुम्हारी प्रतीक्षा यही पेड़ के नीचे बैठकर कर रहा हुँ। सन्त एक पेड़ के नीचे बैठ जाते हैं और गोपाल स्नान के लिए चला जाता है। गोपाल स्नान करके आता है तब सन्त उससे कहते कि अब बताओ तुम क्या कहना चाहते हो? गोपाल कहता है कि कृप्या आप मुझे ये बताइये कि पुजा – पाठ क्या होता है। और इसे कैसे करते हैं। मुझे इस बारे में कोई ज्ञान नही  है। मैं एक चरवाहा हुँ जो सिर्फ गाय चराना ही जानता है अन्यथा और कुछ नहीं। आप मुझे पुजा – पाठ करने का कोई सरल उपाय बताइये क्योंकि ज्यादा विधी – विधान से पुजा – पाठ करने का न तो मुझे ज्ञान है । और न ही इतनी समझ है कि आपके द्वारा बताऐ विधी – विधान के साथ मैं पुजा – पाठ कर सकुँ। आप कृप्या मेरा मार्गदर्शन करें और कोई सरल उपाय बताऐं। यह सुनकर सन्त ने कहा कि ठीक है, मैं तुम्हें सबसे सरल उपाय बताता हुँ। सन्त ने कहा कि तुम जो कुछ भी ग्रहण करे हो उसको  ग्रहण करने से पूर्व पहले उसका भोग भगवान को लगाना। यह बात सुनकर गोपाल ने कहा ठीक है। ये तो मैं कर सकता हुँ। अगले दिन से जब उसका भोजन आया तो उसने सारा भोजन एक पत्तल में लगाकर पहले भगवान को भोग लगाया। और कहा कि हे प्रभु आकर भोग लगाइये। परन्तु भगवान नही आये। वह उनका इन्तजार करता रहा। इन्तजार करते – करते पुरा दिन बीत गया। तब गोपाल ने भोजन ग्रहण नही किया और सारा भोजन गाय को खिला दिया। दुसरे दिन भी जब भोजन जब भोजन आया तो फिर से गोपाल ने  सारा भोजन एक पत्तल में लगाकर पहले भगवान को भोग लगाया और कहा कि हे प्रभु आकर भोग लगाइये। परन्तु फिर भगवान नही आये। वह उनका इन्तजार करता रहा। इन्तजार करते – करते दुसरा दिन भी बीत गया। तब गोपाल ने भोजन ग्रहण नही किया और सारा भोजन गाय को खिला दिया। तीसरे दिन भी भोजन आने पर गोपाल ने यही किया। चौथे दिन भी गोपाल ने भोजन आने पर यही किया। पाँचवें दिन भी भोजन आने पर गोपाल ने यही किया। ऐसे करते – करते दस – बारह दिन बीत गये। लेकिन गोपाल ने भोजन ग्रहण नही किया क्योंकि भगवान ने भोजन ग्रहण नही किया था। ऐसे करते – करते पन्द्रह – बीस दिन निकल गये। गोपाल ने भोजन ग्रहण नहीं किया। अब उनकी स्थिति बिगड़ने लगी क्योंकि पचास वर्ष की अवस्था थी । उसके नेत्र बिल्कुल अन्दर घुस चुके थे। आना – जाना भी बहुत मुश्किल हो रहा था । शरीर की शक्ति खत्म हो गयी थी । अठ्ठाइस दिन बाद जब उनकी पत्नी भोजन लेकर आयी तब उन्होंने देखा कि गोपाल का शरीर सुखता चला जा रहा है पर मैं तो रोज भोजन भेजती हुँ। उसको खड़े होने पर भी चक्कर आ रहे हैं। उसकी पत्नी इसका कारण पुछती हैं तो गोपाल कुछ नहीं बताता है। वह सोचता है कि एक दिन तो सबको ही मरना है। मेरे गुरू ने जो कुछ भी कहा है वह सब सत्य है। मेरे प्रभु एक दिन जरूर आऐंगे। तो मैं गुरू आज्ञा का उल्लंघन करके ये महा पाप क्यों करूँ। आज उसे तीस दिन हो गये थे बिना कुछ खाये। आज जब उसकी पत्नी भोजन लेकर आयी तो उसने देखा कि वह बैठ भी नहीं पा रहे हैं। उसकी पत्नी ने जिद की कि आज तुम घर चलो। तो उसने मना कर दिया और कहा कि सिर्फ आज तुम जाओ कल मैं आ जाऊँगा। क्योंकि वह जानता था कि शायद कल की प्रार्थना करने के लिए उसके शरीर में प्राण ही नही रहेंगे। इसलिए उसने अपनी पत्नी को समझा – बुझाकर वापस घर भेज दिया। आज गोपाल ने भगवान को भोजन के लिए अपने हृदय के  अन्तिम बल से पुकारा। बार – बार अपने हृदय की आवाज से प्रभु को पुकार रहा था । अचानक बहुत तेज प्रकाश उसके सामने आया, जिसमें उसे कुछ भी दिखाई नही दे रहा था। बस तेज रोशनी दिखाई दे रही था । तभी उसने सुना कि एक मधुर आवाज में कोई उसका नाम पुकार रहा था। उसने धीरे – धीरे आँखे खोलने की कोशिश की तो देखा गुरू के बताऐ हुए।

रंग – रूप, सुन्दर मधुर मुस्कान वाले गोविन्द खड़े थे । उसमें सामर्थ शक्ति नहीं थी कि वह गोविन्द के चरणों मे सर रखकर उन्हें प्रणाम कर सके। उसने भगवान को इशारा किया कि थोड़ा पास आ जाओ ताकि मैं आपके चरण स्पर्श कर सकुँ। भगवान उसके पास आते हैं तो वह अपना सर भगवान के चरणों में रखकर अपने आँसुओं से भगवान के चरणों को धोता है। भगवान अपने भक्त को दोनों हाथों से उठाते हैं और कहते हैं कि अरे गोपाल तु रो क्यों रहा है। मुझे तेरा दिया हुआ भोजन बहुत प्रिय है। देखो मैं तुम्हारे द्वारा दी हुई रोटियाँ खा रहा हुँ । इतने प्रेम – भाव से दिया हुआ भोजन मुझे अत्यधिक प्रिय है। भगवान जब गोपाल को स्पर्श करते हैं तो क्षण भर में उसकी इतने दिनों की भूख – प्यास, दुर्बलता, थकावट सब दूर हो जाती है। उसे महसुस ही नही हो रहा होता है कि वह इतने दिनों से भूखा – प्यासा था । उसका शरीर पहले की भाँति स्वस्थ हो जाता है।  उसे ऐसा लग रहा था मानो कि उसे कभी दुर्बलता आई ही न हो। भगवान उससे कहते है कि गोपाल अब तू यहाँ से अपने घर जा । तुझे कोई चिन्ता नही है। अपने बन्धु – बान्धुओं के साथ अपना जीवन सुख पुर्वक अपना जीवन व्यतीत कर । अन्त में तू मेरे गोलोक धाम को आयेगा। भगवान ने उसकी रोटियाँ खाई और प्रसाद रूप में उसके लिए छोड़कर अंतर्ध्यान हो गये। गोपाल ने उस प्रसाद को ग्रहण किया और कई वर्षों तक अपने परिवार के साथ सुख पुर्वक जीवन यापन करने के बाद अन्त में भगवान के धाम गया।