प्रेमानन्द महाराज जी का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के कानपुर में हुआ । इनका परिवार एक ब्राह्मण और सात्विक परिवार  है । इनके बचपन का नाम अनिरूद्ध कुमार  पान्डे है । इनके पिता जी का नाम श्री शम्भु पाण्डे था, तथा माता का नाम श्रीमति रमा पाण्डे था । इनके परिवार में सबसे पहले इनके दादा जी ने सन्यासी जीवन को स्वीकार किया। प्रेमानन्द महाराज जी के पिता भगवान की भक्ति किया करते थे और इनके बड़े भाई भी प्रतिदिन भागवत् गीता का पाठ किया करते थे । जिस कारण इनके परिवार का वातावरण अत्यधिक शुद्ध, सात्विक, निर्मल और भक्तिमय था । जिसकी वजह से उनके घर सन्तो का आना – जाना लगा रहता था । महाराज प्रेमानन्द जी जब थोड़े बड़े हुए तो वह प्रतिदिन चालीसा का पाठ किया करते थे । जब प्रेमानन्द जी महाराज 5वीं कक्षा में थे उनके मन मे बहुत से सवाल थे । उन सवालो के उत्तर जानने के लिए उन्होंने श्री राम नाम और श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी नाम का कीर्तन आरम्भ कर दिया। फिर  उन्होंने भागवत गीता का पाठ करना प्रारम्भ कर दिया। इन सभी कारणों की वजह से महाराज जी की रूची अध्यात्म की ओर बढ़ती चली गयी। जिस कारण इन्हें अध्यात्मिक ज्ञान की जानकारी होने लगी । वह पीले कपड़ों को धारण करते थे इसलिए यह पीले बाबा के नाम से भी विख्यात हैं। उनको यह ज्ञान हो चुका था कि ईश्वर के सिवा इस संसार में अपना कोई नहीं है। इसलिए उन्होंने 9वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद घर छोड़कर ब्रह्मचर्य जीवन अपनाने का निश्चय किया। वह अपनी माता जी से अधिक स्नेह करते थे इसलिए उन्होंने अपने मन की बात अपनी माता जी से कही। अपने पुत्र की बात सुनकर माता जी ने कहा कि भगवान भागने से नही मिलते । भगवान बैठकर ध्यान करने से मिलते हैं। महाराज जी ने अपनी माता की बात सुनकर कहा कि मैं ब्रह्मचारी जीवन जीना चाहता हुँ। उनकी माता ने उनकी इस बात पर ज्यादा ध्यान नही दिया। उन्होंने सोचा कि सत्संग सुनकर बच्चा यह बात कह रहा है। और वह फिर अपने काम में लग गयीं। प्रेमानन्द महाराज जी ने 13 वर्ष की आयु में अपना घर छोड़ दिया। और वाराणसी पहुँच गये। वाराणसी पहुँच कर उन्होंने  तुलसी घाट के किनारे पीपल के पेड़ की छाया में रहकर अपना संकीर्तन प्रारम्भ किया । महाराज जी प्रतिदिन गंगा जी में स्नान करके तुलसी घाट के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे आसन लगाकर कुछ देर माँ गंगा जी और बाबा भोले नाथ की अराधना किया करते थे । उसके पश्चात् भोजन के समय वह भिक्षा मांगने की बजाय अक भिक्षुक की भाँति, भिक्षुक की कतार में बैठ कर 10 से 15 मिनट प्रतिक्षा किया करते उस अन्तराल के बीच यदि कोई उनको भोजन दे जाता तो वो कर लेते और यदि नही दे जाता तो गंगा जल पीकर अपना गुजारा कर लिया करते थे। इस कारण महाराज जी को कई दिनों तक भुखा भी रहना पड़ जाता था। उन्होंने ईश्वर को पाने के लिए कठिन तपस्या की। तब से उनका सम्पुर्ण जीवन भगवान को समर्पित हो गया।  

      एक बार प्रेमानन्द महाराज जी अपने प्रतिदिन की करने वाली क्रियाओं के अनुसार तुलसी घाट के किनारे बैठकर अराधना कर रहे थे । तभी वहाँ एक साधु का आगमन हुआ । उन्होंने कहा महाराज जी काशी के विश्व विद्यालय में रासलीला का आयोजन हुआ हैं चलिए हम भी रासलीला देखने चलते हैं। यह सुनकर महाराज जी ने रासलीला देखने जाने से इन्कार कर दिया, क्योंकि महाराज जी एकान्त में रहना पसन्द करते थे । परन्तु वे साधु, महाराज जी को जैसे लेकर ही जाना चाहते थे, वे हठ करने लगे। महाराज जी के बार – बार मना करने के बाद भी नही माने । तो महाराज जी ने उनकी हठ को देखते हुए रासलीला देखने जाने के लिए तैयार हो गये। जब वह साधु और महाराज जी रासलीला देखी। तो महाराज जी को रासलीला में इतना आनन्द मिला कि वे प्रतिदिन रासलीला देखने आने लगे। एक महीने प्रतिदिन रासलीला देखते – देखते जो कलाकार रासलीला कर रहे थे उनकी रासलीला करने की अवधी पुरी होने लगी। तब महाराज जी ने सोचा कि कल यह कलाकार वापस चले जाऐंगे तब मैं यह रासलीला कैसे देखुंगा। यह सोचकर महाराज जी ने वृन्दावन जाने का निश्चय किया। फिर महाराज जी वृन्दावन चले गये। और वहाँ जाकर भ्रमण करना प्रारम्भ कर दिया। फिर वह वृन्दावन मे ही निवास करने लगे। प्रेमानन्द जी का आश्रम का नाम राधा केली कुंज है जो महाराज जी का निवास स्थान है। अपने आश्रम में ही वे भजन कीर्तन किया करते हैं उनके साथ अन्य सन्त जन भी भक्ति करते हैं। इस प्रकार वह राधा – रानी और श्री बाँके बिहारी की ओर आकर्षित होते चले गये। उसके बाद नाम संकीर्तन के साथ – साथ महाराज जी ने भक्तो को सही राह दिखाने के लिए प्रवचन देना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार वह भक्तो से बात – चीत कर उनको सही राह दिखाया करते हैं।  जिन्हें एकांतिक वार्तालाप कहा जाने लगा।

   एक बार महाराज जी की अचानक तबीयत खराब होने के कारण उनको राम कृष्ण मिशन में जाँच के लिए ले जा या गया । डॉक्टर ने जाँच की, जाँच करके महाराज जी से कहा कि गुरू जी वैसे तो हम मरीज की बिमारी के बारे में उनके परिवार वालों को बताते हैं परन्तु आपके परिवार में आप अकेले ही हैं इसलिए आपको बता रहा हुँ कि आपकी दोनों किडनिया आधी खराब हो चुकी हैं। और कुछ समय पश्चात् आपकी दोनों किडनिया पुर्णतः समाप्त हो जाऐगी। इस कारण आप 2 से 3 साल या अधिक से अधिक 4 से 5 साल तक जीवित रह सकते हैं इससे ज्यादा आपका जीवित रहना बहुत मुश्किल है। फिर भी महाराज जी ने अपना भजन – कीर्तन, प्रवचन आदि क्रियाऐं उसी प्रकार करते रहे जिस प्रकार उन्होंने वृन्दावन आने के बाद आरम्भ किया था । और अपना जीवन हरि नाम में समर्पित कर दिया । ऐसा करने पर महाराज जी पर राधा रानी जी की ऐसी कृपा हुई कि आज महाराज जी की किडनी खराब हुए 19 साल हो गये फिर भी वह जीवित है और बिल्कुल स्वस्थ है। अब भी महाराज जी उनकी शरण में आये भक्तजनो  से बात – चीत कर उनको जीवन जीने की सही राह दिखाते हैं। जिसे प्रेमानन्द जी के एकांतिक वार्तालाप नाम से जा जाता है।