• आलस्यं मदमोहौ च चापलं गोष्ठिरेव च ।

       शतब्धता चाभिमानित्वं तथात्यागित्वमेव च ।।

       एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ।।

                                                                    (विदुरनीति 8/5)

आलस्य, मद-मोह, चंचलता, गोष्ठी, उद्दंडता, अभिमान और लोभ – ये सात विद्यार्थियों के लिए सदा ही दोष माने गए हैं ।

  • अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभिता ।

       अशौचत्वनिर्दयत्वं च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ।।

                                                               (चाणक्यनीति 2/1)

झूठ बोलना, बिना विचारे किसी काम को उतावलेपन में करना, कपट, मूर्खता, लालच, अपवित्रता और दयाहीनता – ये सब स्त्रियों के स्वाभाविक दोष है ।

  • बहूनपि गुणानेको दोषे ग्रसति ।

                                     (चाणक्यसूत्र 170)

मनुष्य का एक भी दोष बहुत से गुणों को दोषपूर्ण बना डालता है ।

  • विनाशे बहवो दोषा जीमन्प्राप्नोति भद्रकम् ।

       तस्मात्प्राणान्धरिष्यामि ध्रुवो जीवति संगमः ।।

                                                  (वाल्मीकिरामायण / सुन्दरकांड 13/47)

इस जीवन का नाश कर देने में बहुत से दोष हैं । जो पुरुष जीवित रहता है, वह कभी न कभी अवश्य कल्याण का भागी होता है, अतः मैं इन प्रणों को धारण किए रहूंगै । जीवित रहने पर अभीष्ट वस्तु अथवा सुख की प्राप्ति अवश्यम्भावी है ।

  • नास्त्यकीर्तिसमो मृत्यर्नास्ति क्रोधसमो रिपुः ।

       नास्ति निन्दासमं पापं नास्ति मोहसमासवः ।।

       नास्त्यसूया-समाकीर्तिर्नास्ति कामसमोअनलः ।

       नास्तिरागयमः पाशो नास्ति संग-समं विषम् ।।

                                                     (नारदपुराण / पूर्वभाग / प्रथमपाद 7/41/42)

बदनामी के समान कोई मृत्यु नहीं है । क्रोध के समान कोई शत्रु नहीं है । निन्दा के समान कोई पाप नहीं है और मोह के समान कोई भय नहीं है । ईर्ष्या के समान कोई कलंक नहीं है । कामवासना के समान कोई अग्नि नहीं है । आसक्ति के समान कोई बन्धन नहीं है और बुरी संगत के समान कोई विष नहीं है अर्थात् इन सभी से सदैव सावधान रहना चाहिए ।

  • नैव पश्यन्ति जन्मान्धाः कामान्धो नैव पश्यति ।

       मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति ।।

                                                                (चाणक्यनीति 6/8)

जन्म के अंधे नहीं देखते हैं, कामांध को भी नहीं दिखाई देता है । मतवालों को भी नहीं सूझता है और स्वार्थी स्वार्थवश अपना दोष नहीं देखता है ।

  • परस्वानां च हरणं परदाराभिमर्शनम् ।

        सुहृदामतिशंका च त्रयो दोषाः क्षयावहाः ।।

                                                 (वाल्मीकिरामायण / युद्धकांड 87/23)

दीसरे के धन को चुरा लोना, दूसरे की स्त्री के साथ संभोग करना, और अपने शुभचिन्तकों पर अति शंका करना – ये तीन देष भयंकर विनाशकारी होते हैं ।

  • हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम् ।

       सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षयावहाः ।।

                                                     (विदुरनीति 1/70)

दूसरे के धन का हरण, दूसरे की स्त्री का संसर्ग तथा सुहृद्मित्र  का परित्याग – ये तीनों ही दोष नाश करने वाले होते हैं ।

  • नाल्पदोषाद् बहुगुणास्त्यज्यन्ते ।

                                            (चाणक्यसूत्र 179)

किसी के साधारण दोष को देखकर उसके महत्वपुर्ण गुणों को अस्वीकार नहीं करना चाहिए ।

  • सिते हि जायते शितेः सुलक्ष्यता ।

                                        (नैषधीयचरित 12/22)

सफेद वस्तु के बीच कालिमा सरलता से दिखाई दे जाती है अर्थात् सज्जनों के पास थोड़ी बुराई भी पहाड़ जैसी दीख जाती है ।

  • अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।

        चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

                                                  (स्कंदपुराण / गुरुगीता 44)

अज्ञान रूपी अंधता के दोष को दूर कर ज्ञान के अंजन की सलाई से जो नेत्रों को खोल दे और देखने लायक बना दे, उस गुणसत्ता को नमस्कार है ।

  • यत एवागतो दोषस्तत एव निवर्तते ।

        अग्निदग्धस्य विस्फोटशान्तिः स्याद्ग्निनाध्रुवम् ।।

                                                               (सुभाषित भंडगार 175/699)

जिससे जो दोष उत्पन्न होता है, उसी से उशका शमन भी होता है, जैसे अग्नि से जले हुए फोड़े की शान्ति अग्नि की सेंक से ही होती है ।

  • न विषादो मनः कार्यं विषादो दोषवत्तरः ।

        विषादो हन्ति पुरुषं बालं क्रुद्ध इवोरगः ।।

                                          (वाल्मीकिरामायण / किष्किन्धकांड 64/9)

मन को विषाद (दुःख) में नहीं डालना चाहिए क्योंकि विषाद में बहुत बड़ा दोष है । जैसे क्रुद्ध सांप पास आए हुए बालक को काट खाता है, उसी प्रकार विषाद भी पुरुष को काट खाता है ।

  • अर्थी दोषं न पश्यति ।

                              (चाणक्यनीति 6/8)

स्वार्थी स्वार्थवश अपना दोष नहीं देखता है ।

  • षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।

        निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधं आलस्यं दीर्घसूत्रता ।।

                                                        (विदुरनीति 1/83)

ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींद, तन्द्रा (ऊंघना) डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता  (जल्दी हो जाने वाले कामों में अधिक देर लगाने की आदत) इन छह दुर्गणों को त्याग देना चाहिए ।