• तीर्थैस्तरन्ति प्रवतो महीरिति यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति ।

        अत्रादधुर्यजमानाय लोकं दिशो भूतानि यदकल्पयन्त ।।

                                                                               (अथर्ववेद 18/4/7)

जिस तरह यज्ञ करने वाले यजमान यज्ञादि द्वारा बड़ी-बड़ी आपत्तियों से मुक्त होकर पुण्यलोक की प्राप्ति करते हैं, उसी प्रकार तीर्थयात्रा करने वाले तीर्थयात्री तीर्थादि द्वारा बड़े-बड़े पापों और आपत्तियों से मपक्त होकर पुण्यलोक (स्वर्ग) की प्राप्ति करते हैं ।

  • पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गंगायां मध्यमेषु च ।

        स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्त सप्तावरांस्तथा ।।

                                                               (महाभारत / वनपर्व 85/92)

हुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा और प्रयाग आदि मध्यवर्ती तीर्थों में स्नान करने वाला मनुष्य अपनी सात पीछे की और सात आगे की पीढ़यों का उद्धार कर देता है ।

  • यस्य हस्तौ च पादौ च वाङ्मनस्तु सुसंयते ।

        विद्या तपश्य कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते ।।

        अश्रद्दाधानः पापात्मा नास्तिकोअच्छिसंशयः ।

        देतुनिष्ठाश्च पंचैते न तीर्थफलभागिनः ।।

                                                     (भविष्यपुराण / उत्तराखंड 122/7-8)

जिसके हाथ, पैर, मन और वाणी सुसंयत हैं तथा जिसकी विद्या, कीर्ति और तपस्या पूरी है, उसे ही तार्थ का फल मिलता है । श्रद्धापहित, पापी, संशयग्रस्त, नास्तिक और तार्किक – इन पांच प्रकार के लोगों को तीर्थ का फल नहीं मिलता ।

  • तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञोरपि विशिष्यते ।

                                                      (महाभापत / वनवर्ष 82/17)

तीर्थ-यात्रा का पुण्य कार्य है । यह यत्रों से भी बढ़कर है ।

  • निगृहीतेन्द्रियग्रामो यत्रैव च वसेन्नरः ।

        तत्र तस्य कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च ।।

                                                     (स्कंदपुराण / काशीखंड 6/40)

जिसने इंद्रियसमूह को वश में कर लिया है, वह मनुष्य जहाँ भी निवास करता है, वहीं उसके लिए कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ है ।

  • तीर्थानां स्मरणं पुश्यं दर्शनं पापनाशनम् ।

        स्नानं मुक्तिकरं प्रोक्तमपि दुष्कृतकर्मणः ।।

                                                        (वामनपुराण 33/4)

तीर्थों का स्मरण पुण्य देने वाला, पापियों के लिए भी दर्शन पापनाशक और स्नान मुक्तिकारक कहा गया है, फिर पुण्यात्माओ के लिए तो कहना ही क्या है ।

  • ब्राह्मणाः जंगम तीर्थः निर्जलं सार्वकामिकम् ।

       येषा वाक्योदकेनैव शुद्धयन्ति मलिना जनाः ।।

                                                             (शातातपस्मृति 30)

साधु-ब्राह्मण चलते-फिरते तीर्थ है, जिनके सद्वाक्य रूपी निर्मल जल से कलुषित विचों वाले भी शुद्ध हो जाते हैं ।

  • ऐश्वर्यं लोभमोहाद् वा गच्छेद् यानेन यो नरः ।

        निष्फलं तस्य तत्सर्वं तस्माद्यानं विवर्जयेत् ।।

                                                              (मत्स्यपुराण 106/7)

ऐश्वर्य के गर्व से, मोह से या लोभ से जो सवारी पर चढ़कर तीर्थयात्रा करता है उसकी तीर्थयात्रा निष्फल हो जाती है ।

  • यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम् ।

        निर्विकाराः क्रियाः सर्वा स तीर्थफलमशनुते ।।

                                                             (स्कंदपुराण / कुमारखंड 2/6)

जिसके हाथ, पैर और मन भली-भांति संयम में हैं तथा जिसकी सभी क्रियाएं निर्विकार भाव से संपन्न होती हों, वही तीर्थ का पूरा फल प्राप्त करता है ।

  • अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः ।

        न तत् फलमवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत् ।।

                                                              (महाभारत / वनपर्व 82/19)

मनुष्य तीर्थयात्रा से जिस फल को पाता है, उसे बहुत दक्षिणा वाले अग्निष्टोम आदि यज्ञों द्वारा यजन करके भी कोई नहीं पा सकता ।

  • कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमाविशेत् ।

        न तेन किंचिद् प्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत् ।।

                                                                 (नारदपुराण)

जो काम, क्रोध और लोभ को जीतकर तीर्थ में प्रवेश करता है, उसे तीर्थयात्रा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है ।

  • तीर्थानां हृदयं तीर्थः सुचीनां हृदयं सुचिः ।

                                                           (महाभारत / शांतिपर्व 191/18)

सब तीर्थों में हृदय (अंतरात्मा) ही परम तीर्थ है । सब पवित्रताओं में अंतरात्मा की पवित्रता ही मुख्य है ।

  • चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानान्न शुद्धियति ।

       शतशोअपि जलैर्धौतं सुराभाण्डमिवां शुचिः ।।

                                                          (स्कंदपुराण / काशीखंड 6/38)

चित्त के भीतर यदि दोष भरा है, तो वह अनेक तीर्थ-स्नानों से भी शुद्ध नहीं हो सकता । जिस प्रकार मदिरा से भरे हुए घड़े को ऊपर से जल द्वारा सैकड़ों बार धोया जाए तो भी वह पवित्र नहीं होता ।

  • न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ।

        ते   पुनन्युरुकालेन   दर्शनादेव   साधवः ।।

                                                          (श्रीमद्भागवत 10/48/31)

केवल जल के तीर्थ (नदी, सरोवर आदि) ही तीर्थ नहीं हैं । केवल मृत्तिका और शिला आदि की बनी हुई मूर्तियां ही देवता नहीं हैं । उनकी तो बहुत दिनों तक श्रद्धा से सेवा की जाए, तब वे पवित्र करते हैं, परंतु संत पुरुष तो अपने दर्शन मात्र से ही पवित्र कर देते हैं ।