• धर्मेण धार्यते लोकः ।

                                (चाणक्यसूत्र 234)

धर्म ही संसार को धारण किए हुए है ।

  • धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित् ।

                                                                               (महाभारत / वनपर्व 263/44)

जो धर्म परायण हैं, वे कभी संकट को नहीं प्राप्त होते हैं ।

  • त्रयो धर्मस्कन्धा यत्रोअध्ययनं दानमिति ।

                                                                             (छान्दोग्योपनिषद् 2/23/9)

धर्म के तीन आधार हैं – यत्र, अध्ययन और दान ।

  • धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम् ।

          धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ।।

                                                           (वाल्मीकिरामायण / अरण्यकांड 9/30)

धर्म से ही धन मिलता है और धर्म से ही सुख मिलता है । अधिक क्या,धर्म से सब कुछ मिल जाता है । अतः इस विश्व में धर्म ही सार-सर्वस्व ग्राह्य वस्तु है ।

  • धर्मज्ञः पण्डितो त्रेयः ।

                                     (महाभारत / वनपर्व 313/98)

धर्मत्र (धर्म जानने वाले) को बुद्धिमान समझना चाहिए ।

  • श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।

          स्वधर्मे   निधनं   श्रेयः   परधर्मो   भयावहः ।।

                                                          (श्रीमद्भगवद्गीता 3/35)

अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरों के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है । अपने धर्म में तो मरना ही  कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है ।

  • धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।

                                                              (महाभारत / स्वर्गारोहण 5/62)

धर्म के सेवन से ही अर्थ- धन-समृद्धि और समस्त अभीप्सित पदार्थों के प्राप्ति होती है । धर्म से ही कामनाओं की पूर्ति होती है । फिर उस एक ही धर्म का सेवन क्यों न किया जाय ?

  • धर्मो हि हतो हन्ति न संशयः ।

                                           (महाभारत / आदिपर्व 41/22)

यदि धर्म को नष्ट किया जाए, तो वह मनुष्य का नाश कर देता है । इसमें संशय नहीं है ।

  • धृतिः क्षमा दमोअस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।

          धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।

                                                               (मनुस्मृति 6/92)

धैर्य, क्षमा, दम, अस्तेय (चोरी न करना), शौच (मन, वाणी और शरीर की पवित्रता), इंद्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध – ये धर्म के दस लक्षण हैं ।

  • चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितयौवने ।

          चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।।

                                                              (चाणक्यनीति 5/20)

इस चराचर जगत् में लक्ष्मी, प्राण, यौवन और जीवन सब कुछ नाशवान है, केवल एक ही धर्म ही अटल है ।

  • धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति नैतत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम् ।

                                                                     (गरुड़पुराण 1/115/52)

जो सत्य नहीं है, वह धर्म नहीं है और जो छल से युक्त है, वह सत्य नहीं है ।

  • न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्म त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।

          नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।।

                                                                        (महाभारत / स्वर्गरोहण 5/63)

मनुष्य को किसी भी समय काम से, लोभ से या जीवनरक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि धर्म नित्य है और सुख अनित्य है तथा जीव नित्य है और जीवन का हेतु अनित्य है ।

  • धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।

          यस्माद्धारयते सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।।

                                                   (वाल्मीकिरामायण / उत्तराकांड 2-7)

 धर्म संपूर्ण जगत् को धारण करता है, इसलिए उसका नाम धर्म है । धर्म ने ही समस्त प्रजा को धारण कर रखा है क्योंकि वही चराचर प्राणियों सहित तीनों लोकों का आधार है ।

  • अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता ।

          भूतप्रियहितेर्हा च धर्मोअयं सार्ववर्णिकः ।।

                                                      (श्रीमद्भागवत 11/17/21)

चारों वर्णों और चारों आश्रमों के लिए साधारण धर्म यह है कि मन, वाणी और शरीर से किसी की हिंसा न करें । सत्य पर दृढ़ रहें, चोरी न करें, काम, क्रोध तथा लोभ से बचें और जिन कामों के करने से समस्त प्राणियों की प्रसन्नता और उनका भला हो, वही करें ।

  • न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः ।

          एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्य प्रवर्तते ।।

                                                    (महाभारत / अनुशासनपर्व 113/8)

जो बात अपने को अच्छी न लगे, वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिए । यही धर्म का संक्षिप्त लक्षण है । इससे भिन्न जो बर्ताव है, वह कामनामूलक है ।

  • धर्म न दूसर सत्य समाना ।

          आगम निगम पुरान बखाना ।।

                             (श्रीरामचरितमानस / अयोध्याकांड 84/5)

सत्य के समान कोई दूसरा धर्म नहीं है, जिसकी प्रशंसा वेद, पुराण तथा शास्त्रों में है ।

  • नास्ति धर्मात् परो बन्धुर्नास्ति धर्मात् परं धनम् ।

          धर्मात् प्रियः परः को वा स्वधर्म रक्ष यत्नतः ।।

          स्वधर्मे रक्षिते तात शाश्वत सर्वत्र मंगलम् ।

          यशसं सुप्रतिष्ठां च प्रातपः पूजनं परम् ।।

                                  (ब्रह्मवैवर्तपुराण / श्रीकृष्णजन्मखंड62/22-23)

धर्म से श्रेष्ठ बंधु कोई नहीं है और धर्म से बढ़कर धन नहीं है । धर्म से अधिक प्रिय और उत्तम कौन है ? अर्थात् कोई नहीं । अतः आप यत्नपूर्वक अपने धर्म की रक्षा कीजिए । स्वधर्म की रक्षा करने पर सदा और सर्वत्र मंगल होता है । यश, प्रतिष्ठा, प्रताप और परम आदर की प्राप्ति होती है ।

  • अधर्मेणैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति ।

          ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ।।

                                                        (मनुस्मृति 4/174)

अधर्म से मनुष्य पहले तो एक बार बढ़ता है, फिर मौज, शौक, आनंद भी प्राप्त करता है और अपने छोटे-मोटे शत्रुओं पर धन के बल से विजय भी प्राप्त करता है किंतु अंत में वह देह, धन और संतानादि सहित समूल मष्च हो जाता है ।

  • जीवन्तं मृतवन्मन्ये देहिनं धर्मातजीवितम् ।

          यतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ।।

                                                       (चाणक्यनीति 13/9)

धर्मरहित मनुष्य मरे हुए के समान है । धार्मिक मनुष्य मरने के बाद भी जीवित रहता है, इसमें कोई शक नहीं, क्योंकि उसकी कीर्ति अमर रहती है । ऐसा धार्मिक मनुष्य दीर्घजीवी होता है ।

  • धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभीतानि सर्वदा ।

          तस्मिन् ह्नसति ह्नीयन्ते तस्माद्धर्मं न लोपयेत ।।

                                                                 (महाभारत / शांतिपर्व 90/17)

सभी प्राणी धर्म की वृद्धि होने पर बढ़ते हैं तथा धर्म के घटने पर क्षीण होते हैं, अतः धर्म को कभी लुप्त न होने दें ।