• मातृमान् पितृमानाचार्यावान् पुरुषो वेद ।

                                                      (शतपथ ब्राह्मण)

जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् प्रथम माता, हूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे, तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है ।

  • अक्षेत्रवित् क्षेत्रंव्दं ह्यप्राट् स प्रैति क्षेत्रविदानुशिष्टः ।

        एतद् वै भद्रमनुशासनस्योत स्रुतिं विन्दत्यंजसीनाम् ।।

                                                                          (ऋग्वेद 10/32/7)

मार्ग को न जानने वाला अवश्य ही मार्ग को जानने वाले से पुछता है । वह क्षेत्रज्ञविद्वान से शिक्षित होकर उत्तम मार्ग को प्राप्त होता है । गुरु के शासन का यही कल्याणदायक फल है कि अनुशासित अज्ञपुरुष भी ज्ञान को प्रकाशित करने वाली वाणियों को प्राप्त करता है ।

  • गुकारस्त्वन्धकारः स्याद् रुकारस्तेज उच्यते ।

        अज्ञानग्रासकं    ब्रह्म    गुरुरेव    न    संशयः ।।

                                                           (स्कंदपुराण / गुरुगीता 1/33)

‘गु’ शब्द का अर्थ है – ‘अंधकार’ और ‘रु’ का अर्थ है – तेज । अज्ञान का नाश करने वाला तेजरूप ब्रह्म, गुरु ही है, इसमें संदेह नहीं है ।

  • स्वर्गो धनं वा धान्यं वा विद्या पुत्राः सुखानि च ।

       गुरुवृत्त्यनुरोधेन      न      किंचिदपि      दुर्लभम् ।।

                                                                  (वाल्मीकिरामायण / अयोध्याकांड 30/36)

गुरुजनों की सेवा करने से स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, पुत्र, सुख आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं ।

  • पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ।

        गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।।

                                                            (चाणक्यनीति 5/1)

स्त्रियों के गुरु पति होते हैं और अतिथि सबके गुरु होते हैं । ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के गुरु अग्नि हैं तथा चारों वर्णों के गुरु ब्राह्मण हैं ।

  • विद्यामन्त्रप्रदः सत्यं मातुः परतरो गुरुः ।

        न हि तस्मात्परः कोअपि वन्द्यः पूज्यश्च वेदतः ।।

                                                        (ब्रह्मवैवर्तपुराणत / श्रीकृष्ण जन्मखण्ड 72/112)

यह भी सत्य है कि विद्यादाता और मंत्रदाता गुरु माता से भी बहुत बढ़-चढ़कर आदर के योग्य है । वेद के अनुसार गुरु से बढ़कर वंदनीय और पूजनीय दूसरा कोई नहीं है ।

  • गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई ।

        जो   बिरंची   संकर   सम   होई ।।

                        (श्रीरामचरितमानस / उत्तरकांड 92/3)

संसाररूपी सागर को कोई अपने आप तर नहीं सकता । चाहे वह ब्रह्माजी जैसा सृष्टीकर्ता हो या शिवाजी जैसा संहारकर्ता हो । अपने मन की चाल से, अपनी मान्यताओं के जंगल से निकलने के लिए पगडंडी दिखाने वाले सद्गुरू अवश्य चाहिए ।

  • देवद्विजगुरूप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।

        ब्रह्मचर्यमहिंसा   च   शरीरं   तप   उच्यते ।।

                                                             (श्रीमद्भगवद्गीता 17/14)

देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – ये शरीरसंबंधी तप कहलाते हैं, जो मनुष्य ज्ञान दे और ब्रह्म की ओर ले जाये, उसे गुरु कहते हैं । गुरु उसी को जानिए जो ज्ञान को समझा भी सके और उसका प्रमाण भी दे सके ।

  • गुरुमंत्रो मुखे यस्य तस्य सिद्धयन्ति नान्यथा ।

       दीक्षया   सर्वकर्माणि   सुद्धयन्ति   गुरुपुत्रके ।।

                                                       (स्कंदपुराण / गुरुगीता 2/131)

जिसके मुख में गुरुमंत्र है, उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं, दीसरे के नहीं । दीक्षा लेने मात्र से शिष्य केसभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। 

  • गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।

       गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

                                                      (स्कंदपुराण / गुरुगीता 43)

गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वर हैं तथा गुरु ही परब्रह्म हैं। ऐसे गुरु को बारंबार नमस्कार है ।

  • गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः ।

        दुर्लभोअयं गुरुर्देवः शिष्यसन्तापहारकः ।।

                                                    (स्कंदपुराण / गुरुगीता 2/160)

शिष्य के धन का हरण करने वाले गुरु बहुत से हैं, परंतु शिष्य के दुःख को हरने वाला गुरु दुर्लभ है ।

  • सर्वतीर्थावगाहस्य संप्राप्नोति फलं नरः ।

        गुरोः पादोदकं पीत्वा शेषं शिरसि धारयन् ।।

                                                  (स्कंदपुराण / गुरुगीता 2/207)

श्री सद्गुरु के चरणामृत का पान करने से और उसे मस्तक पर धारण करने से मनुष्य सर्व तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त करता है ।

  • अल्प वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरेति यः ।

        तमपीह गुरुं विधात् श्रुतोपक्रियया ग्या ।।

                                                          (मनुस्मृति 2/149)

जो थोड़ा या अधिक ज्ञान देता है, वह गुरु है ।

  • यो धम्यनि शब्दान् गृणात्युपरिशति स गुरुः ।

        स एष पूर्वषामपि गुरुः कालेनानवच्छदात् ।।

                                                            (योगदर्शन 1/26)

जो सत्यधर्म प्रतिपादक, सकल विद्यासुक्त, वेदों का उपदेश करने वाला, सृष्टि के आदि में अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा एवं ब्रह्मादि गुरुओं का भी गुरु है और जिसका नाश होता, ऐसे उस परमेश्वर का नाम ‘गुरु’ है ।