• धर्मावनायोरुकृतावतारः ।

                                    ( श्रीमद्भागवत 6/8/19)

 भगवान धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते रहते हैं।

  • यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।

         अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

         परित्राणाय साधुनां विनाशाय त दुष्कृताम् ।

         धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।

                                                        (श्रीमद्भगवद्गीता 4/7-8)

भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – जब – जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब – तब ही मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ यानि अवतार लेकर आता हूँ । सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का विनाश और धर्म की अच्छी तरह से पुनः स्थापना – इन तीन कामों के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट दिआ करता हूँ ।

  • हत्वा क्रूरं दुराधर्षं देवर्षीणां भयावहम् ।

          दशवर्षसहस्त्राणि दशवर्षशतानि च ।।

          वत्स्यमि मानुषे लोके पालयन्पृथिवीमिमाम् ।।

                                                                            (वाल्मीकिरामायण / बालकांड 15/29-30)

भगवान विष्णु कहते हैं  – देवताओं और ऋषियों को भय देने वाले उस क्रूर एवं बलशाली राक्षसराज रावण का नाश करके मैं ग्यारह हजार वर्षों तक पृथ्वी का पालन करता हुआ मनुष्यलोक में निवास करूंगा । इस प्रकार भगवान ने देवताओं की प्रार्थना पर दशरथजी के घर मनुष्यरूप में अवतार लेना स्वीकार कर लिया ।

  • निज इच्छा प्रभु अवतरइ सिर महि गो द्विज लागि।

                                                                 (श्रीरामचरितमानस / किष्किंधाकांड 26)

  देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों के लिए प्रङु अपनी इच्छा से अवतार लेते हैं ।

  • न तस्य कार्यकारणं न विद्यते ।

          स्वाभाविकाज्ञा नबलेक्रिया च ।।

                                                  (बृहदारण्यक उपनिष्द्)

संसार को बनाने में ईश्वर का न कोई कार्य – विशेष है और न कोई विशेष प्रयोजन है, किन्तु ज्ञान, बल और क्रिया – ये तीन वस्तुएं भगवान के अन्यतम स्वाभाविक गुण हैं। परमात्मा अपने भक्त की अनन्यबक्ति से प्रसन्न होकर उसका उद्धार करने स्वयं ही अवतरित हो जाते हैं ।

  • असुर मारि थापहिं सुरन्ह, राखहिं निज श्रुति सेतु ।

          जग बिस्तरहिं बिषद जस, राम जन्म करि हेतु ।।

                                                                          (श्रीरामचरितमानस)

अवतारी पुरूष राक्षसों को मारकर देवत्व की स्थापना राम के अवतार का उद्देश्य कहा जाता है ।

  • मर्त्यवतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं पक्षोवधार्येव न केवलं विभोः ।

          कुतोन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ।।

                                                                                                 (श्रीमद्भागवत 5/19/5)

श्री राम के अवतार प्रसंग में कहा दया है कि प्रभो! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिए नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है उन्यथा अपने स्वरूप में ही पमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीताजी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था?

  • न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ।

                                                                                         (श्वेताश्वतरोपनिषद् 2/12)

अवतारों को दिव्य शरीर प्राप्त होने के कारण वह शरीर योगाग्निमय तेज से आलोकित होता है । इसलिए वे सदैव आभा मंडल से अलौकिक व सदैव युवा अवस्था में तेजोमय होते हैं । उन्हें न रोग सताता है, न वृद्धावस्था आती है और न ही वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं ।

  • प्रजापतिश्चरित गर्भेरन्तररजायमानो बहुधा विजायते ।

                                                                                           ( यजुर्वेद 31/19)

 प्रजापालक भगवान गर्भ के मध्य में विचरिता है, यद्यपि वह अजन्मा है, तथापि अनेक प्रकार से उत्पन्न होता है ।