• अग्निहोत्रं च जुहुयादाद्यन्ते द्यु निशो सदा ।

                                                    (मनुस्मृति / गृहस्थ 3/25)

दिन तथा रात्रि के आदि अंत में अर्थात् प्रातः और सायं सदा अग्निहोत्र में हवन करना चाहिए ।

  • नाग्निहोत्रात्परो धर्मः ।

                                     (कूर्मपुराण)

अग्निहोत्र से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।

  • नानाहिताग्निनयिज्वा ।

                                 (वाल्मीकिरामायण 1/6/12)

अयोध्या में ऐसा कोई नहीं था, जो नित्य अग्निहोत्र न करता हो । यानी सभी लोग अग्निहोत्र कर्म करते थे ।

  • अग्निहोत्रेणे प्रणुदे सपत्नान् ।

                                        (अथर्ववेद 9/2/6)

अग्निहोत्र करने से शत्रुओं का नाश होता है ।

  • अग्निहोत्र मुखा यंत्रा सावित्री छन्दसो मुखं ।

          राजामुखं मनुष्साणं नदीनां सागरो मुखं ।।

                                                             (सुत्तनिपात 268/21)

भगवान बुद्ध ने नित्य अग्निहोत्र करने के विलक्षण महत्त्व को बताते हुए कहा था कि जिस प्रकार नदियों में सागर, मनुष्यों में राजा, छंदों में सावित्री छंद मुख्य हैं, उसी प्रकार यज्ञों में अग्निहोत्र मुख्य है ।

  • सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनस्य दाता ।

          वसोर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम ।।

                                                                   (अथर्ववेद 19/55/3)

गृह अग्नि हमें प्रत्येक सायंकाल और प्रत्येक सुबह में सुख-शान्ति, उत्तम चित्त, संकल्प और स्वस्थता देवे । वह प्रत्येक प्रकार के ऐश्वर्य का दाता होवे । हम तुझ यज्ञ की अग्नि को प्रदीप्त करके अपने शरीर को पुष्ट करें । अग्निहोत्र से शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है । वह अध्यात्म का सोपान है ।

  • सहस्त्राक्षेण शतशारदेन शतायुषा हविषाहार्षमेनम् ।

          शतं यथेनं शरदो नयातीन्द्रो विशवस्य दुरितस्य पारम् ।।

                                                                            (ऋगवेद 10/161/3)

हजारों औषधि पदार्थों वाली, सैकड़ों गुणों वाली और सौ वर्ष की आयु देने वाली हवन सामग्री के साथ में यह अग्निहोत्र (यज्ञ) लाया हूँ । इसका बोध कराता हूँ । इसके द्वारा जीवात्मा सौ वर्ष तक की आयु प्राप्त करेगा और सब दोषों से दूर होगा ।

  • आ वंसते मघवा वीरवद् यशः समिद्धो द्युम्न्यादुतः ।

          कुविन्नो अस्य सुमतिर्भवीयस्यच्छा वाजेभिरागमत् ।।

                                                                          (सामवेद/उत्तरार्चिक 4/6/2)

जो मनुष्य अग्नि में भली प्रकार होम करते हैं, उन्हें उत्तम संतान, सद्बुद्धि, धन और धान्य की प्राप्ति होती है ।

  • युगपत् सर्वतीर्थानि युगपत् सर्व देवताः ।

          द्रष्टुमिच्छसि चेद् राजन अग्निहोत्र  ब्रज स्वह ।।

युगों-युगों के तीर्थों को और सभी देवताओं को यदि देखना चाहो, तो हे राजन! जहां अग्निहोत्र होता है, वहां देखो ।

  • अग्निहोत्र विना वेदाः न च दानं विना क्रियाः ।

          न भावे विना सिद्धिस्तस्माद्भावो  हि कारणम् ।।

                                                                       (चाणक्यनीति 18/10)

अग्निहोत्र  के बिना वेद पढ़ना व्यर्थ है, दान के बिना यज्ञादि पूरे नहीम होते । बिना भाव के सिद्धि नहीं होती, इसलिए भाव  (प्रेम) ही सबमें प्रधान है ।