प्रदोष व्रत ,पूजा महत्व





गुरुवार का दिन होने वाले प्रदोष व्रत को गुरु प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। हर माह के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत होता है। चूंकि प्रदोष व्रत की पूजा त्रयोदशी तिथि के प्रदोष काल में, यानी रात्रि के पहले प्रहर में, यानी सूर्यास्त के तुरंत बाद के समय में की जाती है और दिन प्रदोष काल के समय त्रयोदशी तिथि रहेगी। अतः प्रदोष व्रत 26 सितंबर, गुरुवार को है। इसके साथ ही इस दिन भगवान शिव की पूजा करने का दोगुना फल मिलेगा। जानें प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा।
प्रदोष व्रत पूजा विधि
ज्योतिषों अनुसार इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों को निपटाकर स्नान करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लेते हुए भगवान शिव गणपति, कुमार कार्तिकेय, माता गौरा की पूजा और नाग पूजन करें। पूजा के समय घी का दीपक जलाएं।



सबसे पहले भगवान को पंचामृत से स्नान कराएं। पंचामृत में आप शहद, देसी घी, कच्चा दूध, दही, और शक्कर लेकर शिवाभिषेक करें। फिर भगवान शिव को बिल्व पत्र, सुपारी, लौंग, इलायची, फूल, धूप, गंध, चावल, दीप, पान भोग और फल चढ़ाएं। दिनभर भगवान शिव के मंत्र महामृत्युजंय के मंत्र का जाप करें।
ऊं त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम।
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्युर्मुक्षीय माम्रतात।|



शाम को दोबारा स्नान करके शिवजी का षोडशोपचार पूजा करें। भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। माना जाता है कि भगवान शिव को अभिषेक अत्यंत प्रिय है| पूजा के समय पवित्र भस्म से स्वयं को पहले त्रिपुंड लगाना अत्यंत शुभ होता है| साथ ही सत्तू का बना प्रसाद सभी को बांट दें।

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