हनुमानजी की भगवान श्रीरामजी से भेंट




बात उस समय की हैं जब भगवान श्रीराम चौदह बर्ष के वनवास में थे। और हनुमान जी सुग्रीव आदि वानरों के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे। उस समय भगवान राम माता सीता की खोज में वन -वन घूम रहे थे। सुग्रीव ने  राम जी और लक्ष्मणजी को पर्वत के पास आते देखा तो उनको लगा कि इन योद्धाअों को मेरे भाई बालि ने मुझको मारने के लिए तो नहीं भेजा है , वो घबरा गए उन्होंने इस विषय में हनुमानजी से बात की और कहा कि तुम जाकर पता करो , ये कौन है ,कहाँ से आए है और  क्यों आए हैं  अगर कोई भय की बात लगे तो मुझे तुरन्त संकेत करना ,मैं पर्वत छोड़ के चला जाऊँगा ।                    

सुग्रीव को डरा हुआ देख कर ,हनुमानजी ने तुरन्त ब्राह्नाण का रूप लिया और भगवान श्रीराम के पास पहुँच गए ,और दोनोंं भाईयों को प्रणाम करते हुए कहा, कि प्रभू आप कौन हैं और इस वन में क्यों घूम रहे हैं। आप दोनों बहुत कोमल हैं,और ये वन बहुत कठोर है। आप किस प्रकार यहाँ हैं।  हनुमान जी की मन को अच्छी लगने  वाली बातें सुन कर प्रभू श्रीराम ने कहा कि हम आयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र हैं , मेरा नाम राम है और ये मेरा भाई लक्ष्मण है। राक्षसों ने सीता का हरण कर लिया है हम उनको ही खोजते हुए इधर आए है। 

रामजी बोले हे, देव अब आप अपना परिचय दीजिए, भगवान की ये बातें सुन कर हनुमान जी समझ गए कि ये स्वयं भगवान ही हैं वे तुरन्त ही उनके चरणों में गिर गए और कहने लगे कि हे ,प्रभू आप तो सब कुछ जानने वाले है ,सर्वग्य है भला आप मुझसे मेरा परिचय पूछते है। मेरा जन्म तो आपकी सेवा करने के लिए हुआ है ,आप अपने चरणों में मुझे स्थान दीजिए। मेरा कल्याण कीजिए। भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर उनको  उठा कर ह्रदय से लगा लिया। हनुमान जी की आँखों से आँसू बहने लगे। हनुमानजी दोनों भाईयों को साथ लेकर उस पर्वत पर गए ,और सुग्रीव की मित्रता श्रीरामजी से कराई । सुग्रीव ने राम जी को अपने सारे कष्ट बताए । भगवान ने दुष्ट बालि को मार कर सुग्रीव के सारे कष्ट दूर किए और उनको किष्किन्धा का राजा बना दिया। इस तरह हनुमान जी की सहायता से सुग्रीव के सारे कष्ट दूर हूए।

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