श्लोक



अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
प्रकृति स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।।
अर्थ- मैं अजन्मा और अविनाशी- स्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ ।
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।
अर्थ- हे भारतवंशी अर्जुन जब- जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने – आपको साकाररूप से प्रकट करता हूँ ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।
अर्थ- साधुओं (भक्तों) की रक्षा करने के लिये पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की भलीभाँति स्थापना करने के लिए मैं युग- युग में प्रकट हुआ करता हूँ ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वत ।
त्यक्तवा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सो अर्जुन ।।
अर्थ- मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं । इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्म को) जो मनुष्य तत्व से जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है, वह शरीर का त्याग करके पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है ।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता ।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता ।।
अर्थ- राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित , मेरे में ही तल्लीन , मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप , से पवित्र हुए बहुत- से भक्त मेरे भाव (स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं ।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *