श्री हरि को प्रिय अपने भक्त

काकभुशुण्डि जी की स्तुति करने से श्रीहरि बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि हे काक अब मैं तुमको अपना निज सिद्धांत सुनाता हूँ । इसे सुनकर तुम अपने मन में धारण करना और मेरा भजन करना । श्रीहरि कहने लगे कि काक यह सारा संसार मेरी माया से उत्पन्न है और इसमें अनेक प्रकार के चरातर जीव हैॆ । वे सभी जीव मुझको प्रिय हैं क्योंकि सभी मेरे द्वारा ही उत्पन्न किए हुए है परन्तु मनुष्य मुझको अधिक प्रिय है। उनमे भी द्विज, और द्विजों में भी वेदों को धारण करने वाले ,धर्म पर चलने वाले ,उनमें भी विरक्त मुझे प्रिय हैं और वैराग्यवानों में भी मुझे ज्ञानी एवं ज्ञानियों में भी विज्ञानी मुझे अत्यंत प्रिय हैं। परन्तु विज्ञानियों में भी मुझे अपने भक्त अधिक प्रिय हैं मुझे अपने भक्तों से अधिक और कुछ भी प्रिय नहीं हैं। हे, काक पवित्र , सुन्दर बुद्धि वाला सेवक किस को प्रिय नहीं होता अत: चराचर का कोई भी जीव हो ,जो कपट छोड़ कर ,निष्काम भाव से मुझको ही भजता है वो भक्त मुझे प्राणों के समान प्यारा हैं। और वह कभी भी माया के प्रभाव में नहीं पड़ता है।

 

 

 

 

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