वसंत पंचमी में सरस्वती पूजा कथा,वसंत पंचमी की विशेषता और महत्व

भारतीय गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छह ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) में वसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है। पंचमी से वसंत ऋतु का आगमन हो जाता है, इसलिए यह ऋतु परिवर्तन का दिन भी है। इस दिन से प्राकृतिक सौन्दर्य निखरना शुरू हो जाता है। वसंत पंचमी को विशेष रूप से सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है।

माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि यानी वसंत पंचमी का प्रारंभ हो गया है। वसंत पंचमी का हिन्दू धर्म में खास महत्व है। इस दिन ज्ञान, बुद्धि, वाणी और कला की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है। वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा की एक कथा प्रचलित है, जिसमें मां सरस्वती के प्रकट होने और भगवान श्रीकृष्ण से मिले आशीर्वाद का वर्णन प्राप्त होता है। आइए जानते हैं सरस्वती पूजा की प्रसिद्ध कथा के बारे में—
सरस्वती पूजा कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु की आज्ञा से इस संसार के रचयिता ब्रह्मा जी ने मनुष्य योनी बनाई। एक बार वे पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे, तो उन्होंने मनुष्यों और अन्य प्राणियों को देखा। तब उन्हें लगा कि इनके होने के बाद भी काफी शांति है। उनको कुछ कमी लग रही थी। तब उन्होंने अपने कमंडल से जल निकालकर पृथ्वी पर छिड़क दिया। ऐसा करते ही चार भुजाओं वाली एक सुंदर स्त्री प्रकट हुईं। उनके एक हाथ में वीणा, एक में माला, एक में पुस्तक और एक हाथ वर मुद्रा में था। ब्रह्मा जी ने उनको वाणी की देवी सरस्वती के नाम से पुकारा। उन्होंने मां सरस्वती से अपनी वीणा की मदद से सभी प्राणियों को वाणी प्रदान करने को कहा। मां सरस्वती ने अपनी वीणा के मधुर नाद से संसार के सभी जीवों को वाणी प्रदान की। जिस तिथि को ज्ञान और वाणी की देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं, उस दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी थी, जिसे वसंत पंचमी या श्री पंचमी भी कहा जाता है। वसंत पंचमी को मां सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। अपने वीणा से संगीत की उत्पत्ति करने वाली देवी सरस्वती को वीणावादनी, शारदा, बागीश्वरी, भगवती, वाग्देवी आदि नामों से पुकारा जाता है। संगीत की उत्पत्ति के कारण ही उनको कला और संगीत की देवी भी कहते हैं।
श्रीकृष्ण से मां सरस्वती को प्राप्त था ये आशीर्वाद
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण और ब्रह्मा जी ने सबसे पहले मां सरस्वती की पूजा की थी। जब सरस्वती देवी भगवान श्रीकृष्ण पर मोहित हो गई थीं और उनके मन में श्रीकृष्ण को पति स्वरूप में पाने की लालसा हुई। तब यह बात जानकर श्रीकृष्ण ने उनको प्रसन्न करने के लिए आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि ज्ञान, बुद्धि और विद्या प्राप्त करने वाले व्यक्ति माघ शुक्ल पंचमी को आपकी पूजा करेंगे।

वसंत पंचमी के दिन सिद्धि और सर्वार्थसद्धि योग जैसे दो शुभ मुहूर्त का संयोग बन रहा है। इस कारण पंडितों ने इसे वाग्दान, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत आदि संस्कारों और अन्य शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ माना है। ज्योतिषविदों का मानना है कि गुरुवार को वसंत-पंचमी मनाना श्रेष्ठ और शास्त्र सम्मत होगा। वसंत पंचमी इस बार विशेष रूप से श्रेष्ठ है। वर्षों बाद ग्रह और नक्षत्रों की स्थिति इस दिन को खास बना रही है। इस बार तीन ग्रह खुद की ही राशि में रहेंगे। मंगल वृश्चिक में, बृहस्पति धनु में और शनि मकर राशि में रहेंगे। विवाह और अन्य शुभ कार्यों के लिए ये स्थिति बहुत शुभ मानी जाती है।

वसंत पंचमी की विशेषता

वसंत पंचमी को मुहूर्त शास्त्र के अनुसार एक स्वयंसिद्धि मुहूर्त और अनसूज साया भी माना गया है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ मंगल कार्य करने के लिए पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। ज्योतिषविदों के अनुसार, इस दिन नींव पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, व्यापार आरम्भ करना, सगाई और विवाह आदि मंगल कार्य किए जा सकते हैं।

मंत्र
सरस्वती पूजा मंत्र -1 ( Saraswati Pooja Mantra )
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम् पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥1॥
शुक्लाम् ब्रह्मविचार सार परमाम् आद्यां जगद्व्यापिनीम्।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌॥
हस्ते स्फटिकमालिकाम् विदधतीम् पद्मासने संस्थिताम्‌।
वन्दे ताम् परमेश्वरीम् भगवतीम् बुद्धिप्रदाम् शारदाम्‌॥2॥
सरस्वती पूजा मंत्र -2 ( Saraswati Mantra )
सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी, विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु में सदा।
वसंत पंचमी 30 को श्रेष्ठ :
इस वर्ष वसंत पंचमी को लेकर पंचाग भेद भी है। इसलिए कुछ जगहों पर ये पर्व 29 और कई जगह 30 जनवरी को मनेगा। विष्णुलोक के संस्थापक ज्योतिषविद विष्णु शर्मा और अधिकांश ज्योतिषविदों का मानना है कि उदयतिथि ही पूर्ण कालिक तिथि मानी जाती है। पंडित विष्णु शास्त्री के अनुसार, पंचमी तिथि बुधवार सुबह 10.46 से शुरू होगी, जो गुरुवार दोपहर 1.20 तक रहेगी। दोनों दिन पूर्वाह्न व्यापिनी तिथि रहेगी। ज्योतिषविद विभोर इंदुसुत के अनुसार, शास्त्रोक्त दृष्टि से वसंत पंचमी का पूजन सूर्योदय के समय प्रात:काल में ही किया जाता है, इसलिए जिस दिन पंचमी तिथि सूर्योदय के समय उपस्थित होती है, उसी दिन वसंत पंचमी का महत्व होता है। 29 जनवरी को पंचमी तिथि सूर्योदय के समय उपस्थित नहीं होगी, बल्कि मध्याह्न पौने ग्यारह बजे शुरू होगी, जबकि 30 जनवरी को सूर्योदय के समय से ही पंचमी तिथि उपस्थित रहेगी, इसलिए 30 जनवरी को वसंत-पंचमी मान्य और शास्त्र सम्मत होगा।

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