यज्ञ का महत्व




परमात्मा ने सृष्टि के निर्माण के साथ यज्ञ का ज्ञान दिया और अनिवार्य रूप से यज्ञ करने का आदेश भी दिया । तभी से यज्ञ करने की परम्पराएँ भी बनी और लम्बे समय तक चलीं भी , परन्तु  आज इसे मात्र कर्म काण्ड समझकर इस श्रेष्ठ कर्म से दूर हो रहे है।  यज्ञ मात्र कर्मकाण्ड की वस्तु नहीं है अपितु बहुमुखी चिकित्सा  पद्धति भी है। आज के विज्ञान प्रधान युग में प्रायोगिक  तौर पर सफलता के साथ-साथ यज्ञ वैज्ञानिक तरीके से  रोगों के नष्ट करने वाला सिद्ध हुआ है। जिन रोगियों पर यज्ञ -चिकित्सा का प्रयोग किया गया, उसका परिणाम आश्चर्यजनक रहा। यदि हम कहें कि यज्ञ समस्त बिमारियों की दवा है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी । वैदिक काल मेें ऋषि-मनीषियों ने यज्ञ के सर्वविध लाभों से जन सामान्य को लाभान्वित कराने की दृष्टि से अपना सारा जीवन ही नित नये अनुसंधानों में लगा दिया। उन्होनें इस यज्ञको हमारी शादी-विवाह, गृह प्रवेश, एवं मनाव के जीवन में गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक सोलह संस्कारों में भी शामिल किया गया  है। जिससे मानव समाज इस सर्वोउत्तम कर्म को करते हुए लाभान्वित होता रहे। आयुर्वेद में जिन रोगों के शमन के लिए जिन औषधियों का वर्णन किया गया है, उन रोगों के शमनार्थ उन्हीं औषधियों  का हवन करना चाहिए। शारीरिक रोगों के साथ – साथ मानसिक रोगों से भी छुटकारा पाने के लिए यज्ञ चिकित्सा चमत्कारपूर्ण सिद्ध हुई है । आज पूरे विश्व के सामने जो समस्याएँ खड़ी है, उन्हें सुलझाने के लिए यज्ञ एक मशाल की तरह कार्य करेगा  ।




भारतीय संस्कृति , वैदिक संस्कृति का प्रतीक यज्ञ है  यज्ञ इस संस्कृति का मूल है प्रचीन काल से ही  आत्म-साक्षात्कार से लेकर स्वर्ग सुख, बन्धनों से मुक्ति, मन शुद्धि, पाप प्रायश्चित, आत्मबल-प्राप्ति आदि के केन्द्र यज्ञ ही थे। वेद मंत्रोच्चारण के साथ घी व सामग्री की यज्ञाग्नि में आहुति प्रदान करने से जिस यज्ञीय ऊर्जा का निर्माण होता है, वह ऊर्जा इतनी शाक्तिशाली होती है कि जहाँ पर नित्य ऐसी ऊर्जा फैलाई जाती है, वह स्थान देवालय सा दिव्य बन जाता है  वह यज्ञीय ऊर्जा हमारे पूरे शरीर के रोम -रोम से प्रवेश कर श्वास मार्ग हमारे शरीर में स्थित सभी रोगों को नष्ट कर देती है एवं हमारे भीतर की सुस्त शाक्तियों को जागृत कर देती है । इसीलिए हमारे पूर्वज, ऋषि-मुनियों ने सुबह -शाम दैनिक यज्ञ करने का विधान किया है। वैदिक काल में सभी लोग ईश्वर की उपासना व साधना इसी रूप में किया करते थे।

जो व्यक्ति बुद्धि से मन्द हैं अथवा मानसिक विकृतियों से घिरे हैं, यदि वे यज्ञ करें तो उनकी मानसिक दुर्बलताएँ अतिशीघ्र दूर होंगी। यज्ञ से प्रसन्न हुए देव, मनुष्य को धन, वैभव,सौभाग्य तथा सुख-साधन प्रदान करते हैं । यज्ञ करने वाला कभी दरिद्र नहीं रह सकता। यज्ञ करने वाले स्त्री-पुरूषों की संतान बलवान, बुद्धिमान, सुन्दर और दीर्घजीवी होती है। राजा दशरथ को यज्ञ के द्वारा ही चार पुत्ररत्न प्राप्त हुए थे। यज्ञ,दान, तप, इन कर्मों का कभी त्याग  नहीं करना चाहिए, क्योकि जिन्होने कर्म के प्रति आसाक्ति व कर्म फल की आशा दोनों त्याग दिए हों , उन्हें भी पावन करने वाले ये कर्म हैं   जो व्यक्ति यज्ञ शेष अमृत  पान करते है, वे सनातन परब्रह्ना परमात्मा को प्राप्त होते है और यज्ञ न करने वाले को इस लोक में भी सुखों की प्राप्ति नहीं हो सकती हैं। परलोक कैसे सुखकत हो सकता है जिस घर में यज्ञ व वेद मंत्रों की ध्वनि नहीं होती । जो यज्ञ नहीं करते उन्हें तो परमात्मा भी त्याग देते है।




आज अधिकांश लोग यज्ञ को किसी एक समुदाय विशेष का कार्य समझते है लेकिन इस संकीर्ण मानसिकता से हमें ऊपर उठना चाहिए, क्योंकि यज्ञ मात्र कर्मकाण्ड नहीं अपितु सम्पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यज्ञ को अपने जीवन में अपनाने से आप आरोग्य के साथ भौतिक सुख-समृद्धि को भी प्राप्त करेंगे। सम्पूर्ण धरती पर सब प्रकार से लाभ देने वाला सर्वश्रेष्ठ कर्म कोई है, तो  वह यज्ञ ही है।  कल्प वृक्ष के समान सब कुछ देनेे वाला और कोई नहीं यज्ञ ही है ।।

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