दैव सम्पत्ति और आसुर सम्पत्ति

अभयं सत्तवसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: । दानं दमश्च स्वाध्यायस्तप ।।1।। अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्नीरचापलम्।।2। तेज: क्षमा घृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ।।3।। भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि निडरता , अन्त:करण की पूर्ण निर्मलता व्यवहार में दूसरे के साथ ठगी,कपट और झूठ आदि अवगुणों को छोड़कर शुद्ध भाव से आचरण करना , ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति को जानना और उन जाने हुए पदार्थों का इन्द्रियादि के निग्रह से प्राप्त एकाग्रता द्वारा अपने आत्मा में प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना योग है उस ज्ञान और योग में स्थिर हो जाना, तन्मय हो जाना यही प्रधान सात्तिवकी दैवी संपद् है। दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय अर्थात वेद के सत्यों को समझकर उनको अपने अनुभव में लाना,तप,सरलता,अहिसा,सत्य ,अक्रोध , अहंकार व स्वार्थ का त्याग, शान्ति, सभी प्राणियों पर दया ,लालच न रखना ,कोमलता , बुरे काम से लज्जा , अचापल्य ,बिना प्रयोजन वाणी , तेजस्विता ,क्षमा ,शुद्धता ,द्रोह न करना ,घमंण्ड न करना हे तात ! ये गुण दैवी सम्पत्ति में जन्में हुए पुरूषों को प्राप्त होते है।

दम्भो दर्पोेेेSभिमानशच क्रोध: पारूष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ।।4।। हे पार्थ ! दम्भ ,दर्प ,अभिमान , क्रोध , पारूष्य अर्थात वाणी से निष्ठुरता का प्रदर्शन और अज्ञान ,ये आसुरी सम्पत्ति में जन्मे हुए को प्राप्त होते है । इन दोषों से युक्त व्यक्ति को ही तो नृशंस कहते हैं। अज्ञान को आसुरी सम्पदा का एक लक्षण कहा है। अत: ज्ञान दैवी सम्पदा का लक्षण स्वत: ही हो जाता है। दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुच: सम्पदं दैवीमभिजातोेेSसि पाण्डव ।।5।। भगवान कहते है कि -दैवी सम्पत्ति परिणाम में मोक्षदायक और आसुरी बन्धनकारक होती है । हे पाण्डव तु दैवी सम्पत्ति में जन्मा हुआ है, अत: शोक मत कर । इन सब संशयों से बाहर निकलकर धर्म पूर्वक कर्म कर

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