देवउठनी एकादशी



 

देवुत्थान एकादशी  कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है।इस एकादशी को भगवान जागते है तभी इसको देवुत्थान एकादशी  कहते है वैसे तो भगवान कभी नहीं सोते परन्तु मनुष्य की अपनी भावना है  वो अपने भाव से देवशयनी एकादशी को भगवान को सुलाते है और  कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की देवुत्थान एकादशी को  सभी मिलकर भगवान को जगाते है।

इस दिन घरों में बहुत ही सुन्दर साज-सज्जा होती है ,घरों को गेरू से पूता जाता है सभी लोग व्रत रखते है। इस दिन गन्ने व सिंगाड़े से भगवान विष्णु का पूजन होता है घर के सभी सदस्य स्त्री-पुरूष,बच्चे मिलकर  भगवान विष्णु को जगाते है

इस दिन तुलसी और शालिग्राम विवाह भी होता है पुराणों में लेख है कि जिस किसी की अगर कन्या नहीं है तो वो तुलसी के पौधे को  सीचें और कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की देवुत्थान एकादशी को उनका विवाह शालिग्राम जी के साथ विधि पूर्वक सभी रस्मों के साथ आचार्य क द्वारा समपन्न कराएँ,

तुलसी जी का कन्यादान करें तथा अपनी यथा शक्ति के अनुसार आचार्य व सभी को भोज कराएँ। इससे उसको कन्यादान का फल प्राप्त होता है  इस एकादशी के बाद से सभी शुभ कार्य प्रारम्भ हो जाते है

      ओम नमों भगवते वासु देवाये

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