केवट प्रसंग





कथा भगवान राम के वनवास के समय की है रामजी वनवास जा रहे थे और उनकी सारी प्रजा दु:खी हो रही थी जिनके वियोग में पशु-पक्षी इतने व्याकुल हो रहे थे तो उनकी प्रजा,माता-पिता की व्याकुलता की तो कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। रामजी के मन्त्री सुमंत्र तो नगर के बाहर तक आए और वो वापस नहीं जा रहे थे रामजी ने उनको बहुत ही हठ करके नगर को वापस भेजा। भगवान राम केवट से नाव माँगते है तो केवट अपनी नाव देने से मना कर देता है और कहता कि मैंने तुम्हारा भेद जान लिया है तुम्हारे पैरों की धूल लगते ही हर वस्तु मनुष्य रूप ले लेती है, तुम्हारे पैर की धूल लगते ही पत्थर की शिला स्त्री हो जाती है अगर मेरी नाव भी स्त्री बन गई तो मैं लुट जाऊँगा, मेरी रोजी के सारे रास्ते बन्द हो जाएँगे। मैं तो अपने सारे परिवार को पालन पोषण इस नाव से ही करता हुँ। अगर तुम सच में ही पार जाना चाहते हो तो मुझे आप अपने पैर धोने दो,मैं आपके पैर धोने के बाद आपको अपनी नाव में चढ़ दूँगा और आपसे कोई उतराई भी नहीं लूँगा।




लेकिन बिना पैर धोए मैं आपको अपनी नाव में नहीं चढ़ने दूँगा। केवट के प्रेम भरे वचनों को सुन कर रामचन्द्रजी बोले ठीक है,तुम को जो सही लगे वही करो, जाओ जल्दी से जल लेकर आओ। और पैर धो लो ,देरी हो रही है,हमको पार उतार दो। एक बार जिन का स्मरण करने से मनुष्य भव सागर से पार उतर जाता है वही रामचन्द्र जी गंगा से पार उतरने के लिए केवट के नहोरे कर रहे हैं। केवट ने प्रभु की आज्ञा पा कर जल्दी से कठौतें जल भर कर ले आया और बहुत प्रेम से प्रभु के चरणों को धोने लगा  और अपने सारे परिवार के लोगों से भी प्रभु के चरणो को धुला रहा था।


 
चरणों को धोकर सारे परिवार सहित स्वयं भी उस चरणोदक को पीकर पहले अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्रीरामजी को गंगा के पार ले गया। केवट ने प्रभु रामजी,लक्ष्मणजी और माता सीताजी को गंगा जी के तट पर उतार दिया रामजी को बहुत हो रहा था कि मैंने इसको कुछ दिया नहीं। माता सीता उनके मन की बात समझ गई और उन्होने अपनी रत्न जड़ित अँगूठी निकाल कर देने लगी, रामजी बोले केवट तुम अपनी उतराई ले लो। केवट व्याकुल होकर प्रभुश्रीराम के चरणों को पकड़ लेता है और कहने लगता है कि हे प्रभु आप तो सब को भवसागर से पार उतारने वाले हैं मैं आपसे उतराई क्या लूँ अबतक तो मैंने बहुत मजदूरी पाई है, लकिन आज विधाता ने मुझे बहुत दे दिया है। अब मुझे कुछ नहीं चहिए, बस आप हम पर अपनी कृपा बनाए रखिए।

सीताजी के बहुत आग्रह पर भी केवट उतराई नहीं लेता है। करूणा के धाम श्री राम जी ने केवट को भक्ति का वरदान दिया और गंगाजी को प्रणाम कर लक्ष्मणजी और सीता जी के साथ आगे बढ़ गये।



                                        सिया पति रामचन्द्र की जय

 

 

         

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