उत्पन्ना एकादशी



अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे वासुदेव इस संसार में मानव जो पाप कर्म करता है उससे कैसे छूटा जा सकता है सो आप हमें बतलाइये । अर्जुन की इस प्रकार विनती सुन कर श्रीकृष्ण कहने लगे। हे कुन्ती पुत्र अश्वनी मास की कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी के व्रत को करने से मानव के सभी पाप नष्ट हो जाते है । इस एकादशी का बहुत ही महत्व है अगर कोई एकादशी का व्रत प्रारम्भ करना चाहता है तो उस को उत्पन्ना एकादशी से ही करना चाहिए। दानों में सर्वश्रेष्ठ अन्न दान है,और अन्न से भी बढ़कर उत्पन्ना एकादशी के व्रत का प्रभाव है। द्वदशी युक्त एकादशी सर्व श्रेष्ठ मानी जाती है साल की सभी एकादशीयों में नमक वर्जित होता है तथा दोनों पक्षों की एकादशी को समान समझना चाहिए, दोनों में कोई अन्तर नहीं होता है ।


अर्जुन बोले कि हे, वासुदेव आपने एकादशी का महत्व तो बता दिया है अब कृपा करके उत्पन्ना एकादशी की कथा का वर्णन भी कीजिए। कृष्ण बोले कि हे अर्जुन ,प्राचीन समय की बात है मुर नाम का एक दैत्य था उसने अपनी तपस्या से सभी को जीत लिया था । इन्द्र ,वायु पवन आदि सभी देवताओं को भी वह जीत चुका था , सारे देवता उसके भय से भयभीत होकर भगवान शिव के पास पहुचे और हाथ जोड़ कर विनती करने लगे कि प्रभु आप हमारी उस दैत्य से रक्षा करें । महादेव बोले कि तुम्हारी रक्षा तो सिर्फ भगवान विष्णोंजी ही कर सकते है तुम सभी देवता गण श्री हरि नारायण के पास जाओ। सभी देवगण भगवान विष्णोंजी के पास पहुँचते है और हाथ जोड़कर विनती करते है

कि हे, जर्नाधन आप सबकी रक्षा करने वाले है सब का हित करने वाले है , कृपा कर हमारी रक्षा उस दैत्य से करें । उस दैत्य का संहार करें प्रभु। देवताओं की विनती से प्रभु उस दैत्य से युद्ध करते है बहुत समय तक भगवान उस दैत्य से युद्ध करते है परन्तु वो उसको जीत नहीं पाते है तब भगवान उससे मल युद्ध करते है फिर भी वे उसको नहीं जीत पाते है तब भगवान कुछ समय के लिए विश्राम करने का विचार करते है और वे विश्राम के लिए एक गुफा में चले जाते है मुर भी उनके पीछे उसी गुफा में जाता है प्रभु को सोया हुआ देखकर वह उनपर वार करता है तभी भगवान के शरीर से एक शक्ति निकलती है और वह स्त्री का रूप धारण कर लेती है और उस दैत्य से युद्ध करने लगती है तथा उस दैत्य का संहार कर देती है , जब भगवान जागते है तो वह पूछते है कि यह किसने किया है। तो वो हाथ जोड़कर बोलीं हे प्रभु मैं आपके शरीर से उत्पन्न हुई हूँ आप पर प्रहार कर रहे इस दैत्य को मैनें ही मारा है भगवान प्रसन्न हुए और वोले तुम मेरे ही शरीर से एवं एकादशी के दिन उत्पन्न हुई हो तो तुम्हारा नाम उत्पन्ना होगा और सभी तुम्हारी पूजा एवं व्रत करेंगे ,तुम सभी व्रतों में श्रेष्ठ होगी ऐसा मेरा वरदान है

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