अमर कथा (भगवत कथा) जो महादेव ने पर्वती जी को सुनाई





एक बार की बात है भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे थे उसी समय माता पर्वती भगवान के पास आती है, उन्हें प्रणाम करती है और  हाथ जोड़कर  भगवान शिव जी से विनय पूर्वक विनती करती है और कहती है कि हे, स्वामी  ये  अमर कथा क्या है? मैंने इस कथा के विषय में बहुत सुना है ।

आप मुझे भी यह कथा सुनाइये , मेरी बड़ी इच्छा है।  शिवजी ने कहा देवी अगर आपकी अमर कथा सुनने की इच्छा है तो हम आपको ये कथा अवश्य सुनायेगे। देवी यह बहुत गोपनीय कथा है अतः आप हमारे साथ अमरनाथ की गुफा के लिए प्रस्थान करें  । भगवान शिव माता पर्वती के साथ अमरनाथ गुफा में जाते है और कहते है कि देवी जो इस कथा को सुनेगा वो अमर हो जाएगा इस करण ही हम आपको यहाँ लेकर आए है आप देखो तो कि कोई यहाँँ है तो नहीं , माता ने चारों ओर नजर  ड़ाली और कहा प्रभु कोई नहीं है । शिवजी ने कहा कि कथा सुनते समय आप हुं की आवाज करते रहना क्योंकि हम तो कथा सुनाते समय अपने नेत्र बन्द कर लेंगे । शिव जी ने कथा प्रारम्भ की  ,  माता थोड़ी देर तक तो ध्यान से कथा सुनती रहीं  परन्तु कुछ समय बाद उनको नींद आ गईजब भगवान शंकर इस अमृतज्ञान को भगवती पार्वती को सुना रहे थे तो वहां एक शुक (हरा कठफोड़वा या हरी कंठी वाला तोता) का बच्चा भी यह ज्ञान सुन रहा था। पार्वती कथा सुनने के बीच-बीच में हुंकारा भरती थी। पार्वतीजी को कथा सुनते-सुनते नींद आ गई और उनकी जगह पर वहां बैठे एक शुक ने हुंकारी भरना प्रारंभ कर दिया। कथा जब पूरी हो गई तो भगवान ने अपने नेत्र खोले तो देखा कि माता पर्वती तो सो रहीं , वो सोचने लगे कि फिर ये हुंकार कौन भर रहा था उन्होने चारो देखा तो उनको एक छोटा शुक दिखा अब भगवान शिव को सारी बात ज्ञात हो गई।  तब वे शुक को मारने के लिए दौड़े और उसके पीछे अपना त्रिशूल छोड़ा। शुक जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागता रहा। भागते-भागते वह व्यासजी के आश्रम में आया और सूक्ष्म रूप बनाकर उनकी पत्नी वटिका के मुख में घुस गया। वह उनके गर्भ में रह गया।  ऐसा कहा जाता है कि ये 12 वर्ष तक गर्भ के बाहर ही नहीं निकले। जब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं आकर इन्हें आश्वासन दिया कि बाहर निकलने पर तुम्हारे ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा, तभी ये गर्भ से बाहर निकले और व्यासजी के पुत्र कहलाए। गर्भ में ही इन्हें वेद, उपनिषद, दर्शन और पुराण आदि का सम्यक ज्ञान हो गया था। जन्मते ही श्रीकृष्ण और अपने माता-पिता को प्रणाम करके इन्होंने तपस्या के लिए जंगल की राह ली। यही जगत में शुकदेव मुनि के नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

 

 

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *